हर ज़हर बुरा नहीं होता।
थोड़ी मात्रा में तो, botox भी सुंदर बना देता है।
This is a random personal blog - covering everything from poetry to politics. Views presented are strictly my own.
“Charanbai madhu vindati charantsvadu mudambaram.
Suryasya pasya sreemanam yo na tandrayate charan.
Charaiveti, charaiveti.”
Aitareya Brahmana*, 7.15
I am not a Vedic or Sanskrit scholar; yet the verse and its translation fascinated me.
[The literal translation of the verse according to sources is “The honey bee, by its motion, collects honey, and birds enjoy tasty fruits by constant movement. The sun is revered, by virtue of its constant shining movement; therefore, one should be constantly in motion. Keep moving, keep moving on!”]
https://ashaperinchery.wordpress.com/2012/10/12/charaiveti-the-what-the-why/
About 34 months ago, a young man died, purportedly by suicide. However, this young man had mentioned a simple quote - "No one can defeat this industry. Not politicians, not law, no one. Only you can defeat this coterie." After he died, that is exactly what people did. They simply stopped buying from this industry.
इक याद शहर में
बसता था मन
तुमने आस शहर बसाया
मन बोरिया-बिस्तर
उठा ले आया।
सड़कों के नाम रखे
स्वप्नों पर
घर का नाम
रखा "माया"
तुमने आस शहर बसाया
बिसर गया सब भूत
वर्तमान की भूमि पर
केवल भविष्यत् काल को पाया
तुमने आस शहर बसाया।
ऐसी मीठी तान सुनावे
कानों में मिस्री घुल जावे
मास जेठ का होवे सीत
हरे अंब को बनावे पीत।
का सखी, कोयल?
न सखी, प्रीत!
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नटखट मन को लगते प्यारे
खेलें सबहूं साथी हमारे!
लगें एक से, पर हैं न्यारे।
उजले मन, पैरहन कारे।
का सखी, टोली?
न सखी, तारे!
*पैरहन - कपड़े
कारे - काले
सबहूं - सभी
न्यारे - नायाब/ unique
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Updated April 17:
तन पर हो तो देव बनाये
सागर में समावे नीर.
नभ में व्याप्त होवे यूं
पूरा नभ बन जावे झील.
का सखी, ओज?
न सखी, नील.
*
तन पर हो तो देव बनाये - Both Shiva and Vishnu are characterised by blue - Shiva as Neelkanth and Vishnu as blue-bodied.
ओज - light, प्रकाश, रोशनी
My humble attempt at Mukriyaan.
Mukriyaan are known to be written by Amir Khusro, but were possibly in folk culture earlier also because i remember this format in some classic Sanskrit plays.
तुम्हें पता ही था
कि
जब तुम
सब मेहमानों के जाने के बाद
दरवाजा बंद कर के
गहने, भारी दुपट्टा, और मुस्कान
उतार कर
पलंग के सिरहाने रखोगी
और बिस्तर के मुहाने पर
टिकाओगी सर
तब मैं आ ही जाऊंगा
सख्त मुहाने पर पतला सा सिरहाना बन कर।
मुझे भी पता ही था
कि तुम
पतले से सिरहाने को भी
निकाल कर रख दोगी
एक तरफ।
- कोमलता से अधिक भयावह
तुम्हें कुछ नहीं लगता।
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ਤੈਨੂ ਪਤਾ ਸੀ
ਜਦੋਂ ਤੂ ਪਰਾਉਣੇ ਨਿਬੇੜ ਕੇ
ਬੂਆ ਢੁਕਾ ਕੇ
ਵੰਗਾਂ, ਚੁੰਨੀ, ਤੇ ਹਾਸਾ
ਇੱਕ ਪਾਸੇ ਸੂਟ ਕੇ
ਮੰਜੀ ਤੇ ਸਿਰ ਟਿਕਾ ਕੇ ਲੇਟੇਂਗੀ
ਤੇ ਮੈਂ ਆ ਹੀ ਜਾਊਣਾ
ਨਿੱਕਾ ਜੇਹਾ ਸਿਰਹਾਨਾ ਬਣ ਕੇ
ਤੇ ਮੈਨੂ ਪਤਾ ਸੀ
ਕੇ ਤੂ ਸਿਰਹਾਣੇ ਨੂਂ
ਪੂਆਂ ਕੇ ਸੁੱਟ ਛੱਡਣਾ
ਤੈਨੂ ਹਨੇਰਾ ਨਹੀਂ ਡਰਾਉਂਦਾ,
ਤੈਨੂ ਪੀਆਰ ਡਰਾਉਂਦਾ ਹੈ
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Roman transliteration of the Punjabi version:
Tainu pata si
jadon tu paraune nibed ke
bua dhuka ke
vangaan, chunni, te haasa
Ik paase sutt ke
manji te sir tika ke letengi
te main aa hi jaana
nikka jeha sirhana ban ke
te mainu pata si
ke tu sirhaane nu
puaan ke sutt chaddna
Tainu hanera nahi daraundaa
Tenu pyaar daraundaa hai
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कविता, गीत, और छंद में
आज हो गया द्वंद
पहले आया कौन था
हुई शांति भंग!
गीत लाया लय को
तान को लाये छंद,
कविता खड़ी निमानी
किसे ले जाए संग?
ज्ञानी जन शास्त्रार्थ पर
खूब जमा था रंग
कविता लाई एक गवाह
पड़ा रंग में भंग!
गीत की सब पुस्तकें
छंदों के सब शास्त्र
सब पर भारी पड़ गया
कविता का ब्रह्मास्त्र
एक निश्छल हंसी
लाई कविता साथ
उससे पुरातन कुछ भी
कोई न पाया बाँच
सबसे पहली कविता
मन का वह भाव था
जिस में सब सुंदर लगा था
चाहे शब्द न साथ था!
या शायद वह पल जब
पहला आँसू लुढ़का था
जब कंधे पर रखा सर
नींद के मारे ढुलका था
जब शब्द नहीं थे तब भी
कविता मन की कोमलता थी
बचपन में हर बच्चे के पास एक सन्दूकची या बिस्कुट का पुराना डिब्बा होता है, जिस में वह अपना सारा संसार सँजो कर रखता या रखती है। 2 मिनट भी खाली मिलने पर मन उस सन्दूकची के पास भाग जाने को करता है। एक एक चीज उठा कर देखना, उसे बस छू भर कर वापिस रख देना - मन को उस समय जो संतोष मिलता है, वह फिर बड़े होने पर नहीं मिलता।
इस पुस्तक के साथ, मन ने, बहुत सालों बाद, फिर उसी संतोष को पाया। 5 मिनट भी मिलने पर, किताब को उठा कर पढ़ने बैठ जाना, बिल्कुल वैसा ही महसूस होता था, जैसा बचपन की सन्दूकची को चुपके से खोलने पर।
एक-एक कहानी उम्दा। कोई कथानक ऐसा नहीं जिसका अनुमान पढ़ते हुए लगाया जा सके। विषय कुछ ऐसे, जिनके बारे में अमूमन बात नहीं होती, पर उनकी handling ऐसी कि बिल्कुल भी असहज न लगे।
मेरी पसंदीदा कहानी 'उस पल' है, एक बेहद व्यक्तिगत कारण से। पर इस पुस्तक की सभी कहानियाँ अपनी बात कहती है। और वह बात सुनने योग्य है।
जब आप किसी पहाड़ पर या समंदर के किनारे यूं ही वक़्त गुजार रहे हों, और कोई साथी चाहिए हो, जो अच्छी, रोचक बातें करे, तब इस किताब को उठाइएगा।
अब तुम कंधे पर हाथ रखना छोड़ दो।
अरे! क्यूँ?
कंधे पर हाथ वह रखता है, जिसका हमारे ऊपर अधिकार हो।
हम्म... तब तो ठीक है, मुझे कंधे पर हाथ नहीं रखना चाहिए।
हाँ।
तो सुनो, यूं करते हैं, अब तुम मेरे कंधे पर हाथ रख दिया करो।