Sunday, April 05, 2026

About yesterday's poetry gathering

I am still reeling under the effect of yesterday's conversations. 

When we decided to discuss poets and what they mean to us, I was not too enthused because I routinely find such "explanations" get too scholarly and for me, poetry is about emotion, about taking that tornado that has been sleeping in your soul and making it real. 

But yesterday I realised something new - when we take words and add what they did to us, the conversation becomes real for EVERYONE. When Minal spoke about how Harivanshrai Bachchan was the first serious interest in poetry - both for her and for her son, it was not just appreciation of classic poetry. It was that invisible thread that ties us to each other. For parents and children, especially, the cultural reference points are seldom same. The music that shapes them is different, the books they read are different, even the language used to express emotions is not the same.  

In discussing Sahir, what stood out for me was how deeply one poet can enter another. It is not the same as "being under the influence of". It is like someone enters your soul and helps you understand and express yourself. I got the sense that that is what Sahir has done for Harsh. 

Jaun Eliya, of course, was reimagined for all of us. Many years ago, a friend introduced me to Jaun. He then gifted a book of Jaun which i read and was hugely underwhelmed. I really did not understand what all the fuss was about. But EVERY single time someone recites Jaun Eliya, I find the words to be magical. Hearing someone else recite him acts as the catalyst that brings the poet alive. 

But what Sankalp did with Jaun was not just interpret the intrepid nature of Jaun's poetry or his universally known irreverence. He brought that irreverence into us. For a while, we threw the world to the wind and felt exactly as Jaun would have liked us to feel. "Nahi to" remains a highlight of yday's renditions. 

The poetry that flows from the poet is always super special. Kavita mein shabd se bhi zyada, i observe what the poet goes through as they put their words out. And its always heartwarming to see that. :) 



kshanika

पतझड़ और शिशिर के बाद 

पेड़ों को मिलता है 

बसंत 

पत्तों को 

सद्गति। 


पेड़ या पत्ता होना 

नियति भी हो सकती है 

और निर्णय भी 


Friday, April 03, 2026

Kshanika


भूकंप के बाद 

घर वाले 

फोन कर के पूछते हैं, 

"सब ठीक है न?" 


भूकंप. के.        बाद.  

स्मृति और विस्मृति

 तुम्हारे जाने पर 

मैंने शोक संदेश नहीं लिखा 

न भावभीनी श्रद्धांजलि 

न ज़्यादा गला फाड़ कर रोना 


तुम्हारे तन को 

पवित्र अग्नि को अर्पित किया 

और तुम्हें 

अपने भीतर बिठा कर 

अपने घर ले आई। 

पहले पूजा घर में 

फिर रसोई में 

अब पूरे घर में 

रहते हो तुम, 

पिता। 


मेरे मरने पर 

मेरी मिट्टी को 

अग्नि के सुपुर्द करना

और मुझे  

नदी में बहा आना, 

बेटे। 


Thursday, April 02, 2026

Hamaare baare mein

मुझे लगता था तुम आक* हो, और मैं पानी। 

एक को दूसरे को खाली होने तक सींचना होगा, और फिर खाली हाथ वापिस मुड़ जाना होगा।  

पर हम और तुम, धतूरा और आक हैं। साथ में उगते हैं। कोई पालने नहीं आता, पर ज़रूरत के समय हम से लेने में कोई संकोच नहीं करता^। 

ऊपर से देखने पर हम में कोई समानता नहीं है, पर भीतर ही भीतर - जड़ों से और वायु(+) से, हम एक दूसरे का पोषण करते हैं। 

ये कहानी आगे नहीं बढ़ती, हम पर खत्म हो जाती है। पर क्षणभंगुर कहानी को भी होने का अधिकार है। 



RTC: 
+https://www.youtube.com/watch?v=gyOTlBlFEuo

^ धतूरा और आक दोनों शिवरात्रि पर शिव को चढ़ाए जाते हैं। कुछ वैद्य दोनों का उपयोग दावा में करते हैं और कुछ पशुओं के लिए ये खाद्य हैं। इसलिए इन्हें घर पर उगाया नहीं जाता, पोषित नहीं किया जाता, पर इन से लिया जाता है। 

*आक एक खरपतवार (weed) स्वत: उगने वाला पौधा है। इसके पत्ते बकरियों के लिए उत्तम हैं परंतु मनुष्य के लिए ज़हरीले हैं। इसे प्राय: घरों में न उगाया जाता है न उगने दिया जाता है। पौधा बहुत सख्तजान होता है। रेगिस्तान में भी आसानी से उगता और पनपता है। इसलिए राजस्थान जैसे रेतीले क्षेत्रों में बहुधा पाया जाता है।   


On doomscrolling

 Doomscrolling 3 तरह की होती है : 

1. की बनु दुनिया दा? - Worry for the world (war, ecology, ur apocalypse of choice) 

2. मेरा क्या होगा कालिया? - I am doomed. 

3. बाद में? बाद में सिर्फ... - There is no hope anyway. We are all doomed. In the long run, we are all dead. 


So, what's your favourite flavour of doomscrolling? 

1. Pineapple Apocalypse (Stings with every bite but we go on nonetheless) 

2. Syrupy Self doom (Oh, the sweet, sweet taste of self-predicted failure!) 

3. Chocolate No Hope (100% bitter cocoa, and so addictive!)  


Thursday, March 26, 2026

Book Review: Khushboo sa bikharna mera by Amita Parsuram 'Meeta'

इस पुस्तक में अक्षर, गज़लें, और नज़्में है। शायरा की अपनी आवाज़ भी है, और बहर भी है। 

71 ग़ज़लें, 17 नज़्में, और 45 अकेले शेर 140 पन्नों की किताब में समाए हैं। 

लेखिका की आवाज़ उनकी अपनी है। चोट, चोट से निकलता खून, खून पर जमती पपड़ी, और पपड़ी का धीरे धीरे ठीक हो कर गिर जाना - सब कुछ उतनी ही संक्षिप्तता या विस्तार से लिखा गया है, जितना वे लिखना चाहती थीं। 

शेर सीधे दिल में उतरते हैं। यहाँ wordplay नहीं है, लफ़्ज़ों की कारीगरी नहीं है, लफ़्ज़ बस कारगर हैं। 

सब से अच्छा शेर ये लगा: 

रास्ता दूजे का चलते हो  

मंज़िल अपनी ढूंढ रहे हो  


एक शेर जो जॉन एलिया की याद दिलाता है: 


क्या गज़ब है कि मैं तो ज़िंदा हूँ 

और तारीफ हो रही है मेरी 

****** 

कुछ और पसंदीदा शेर: 


दफना दिया था जिनको हर सिम्त गूंजती अब 

मेरी खामोशियों को आवाज़ मिल गई है 

******* 

आँखों मे जब सपने चमके 

जो ओझल थे रस्ते चमके 

**** 

खुद से हार चुका जो मीता 

और भला क्या खो सकता है 

** 

दिल ने जब जब ख्वाब बुने हैं 

ताबीरों ने स्वांग रचे हैं 


रिश्तों के ताने बाने से 

हमने क्या क्या जाल बुने हैं 

******* 

रात की चादर ओढ़ने वालों, 

ऐसे भी क्या दिन रुकते हैं? 

** 

दिल में उतरे लहज़ा लहज़ा 

दिल से उतरे बस इक पल में 


मानो तो सच हो जाता है 

रब मिल जाता है पीपल में 

******* 

जब खुद निकल ना पाया वो दुनिया की कैद से 

खोला कफ़स को और परिंदा उड़ा गया 

** 

उस से दूर बहुत रहना था 

जिस दुनिया में उलझी हूँ मैं 

****** 





This is one of FOUR pending book reviews...and 2 books that are partially read! Onwards, then! 

Friday, March 20, 2026

Short Story

 “कभी कभी टूटे दिल का दर्द ऐसे रिसता है, जैसे नाली के किनारे कट कर पड़ी लाश में से खून।

और कभी, अंदर किसी गुम चोट से धीरे धीरे पड़ते नील जैसा।

मेरा न ये था न वो था। अंदर खून बह रहा था, पर बाहर नील भी नहीं दिख रहा था। बाद में सुना, आँतें चिपक सी गईं थीं तो डॉक्टरों ने ऐसे ही छोड़ दीं। अभी भी जुड़ी हुई हैं शायद। खून का रिश्ता हो गया है उनका एक दूसरे से।“

“धत! कहानी कोई ऐसे शुरू करता है क्या? कहानी शुरू से शुरू कर के, अंत तक ले जानी चाहिए। अंत के बाद से शुरू कर के, शुरुआत तक खींचने का क्या तुक है?” यामिनी हंस कर बोली।

कहने को वह सरल सी गृहिणी थी। और इसी लिए, उसे मानवीय संवेदना की गहरी पहचान थी। उसने मेरे पूरे कथन में जो खून-वून की बात थी, उसे अनदेखा कर दिया। जैसे लोग आत्महत्या का प्रयास करने वाले परिजन से कभी आत्महत्या के बारे में बात नहीं करते। “खाना खाया?” , “दफ्तर गए थे?” “डॉक्टर से मिल लिए?” – इस तरह की बातें करते हैं। मानो दर्द और आत्महत्या छूत की बीमारी हों, जो बोलने भर से लग सकती हैं।

 

मैंने प्रयास किया, पर शुरू से शुरू करने जितना कुछ था ही नहीं। शुरुआत हर प्रेम कहानी की एक सी  होती है – आँखों-आँखों में बातें, पहले एक दूसरे से नज़रें चुराना फिर हार कर इकरार कर लेना... वगैरह वगैरह।

कहानी उस के बाद शुरू होती है।

 

“तुम्हें तुम्हारी खूबसूरती के लिए प्रेम नहीं किया, तुम्हारे मन के लिए किया है।“

“मैं हमेशा तुम से सच बोलूँगा। रोमांटिक नहीं हूँ, पर सच्चा हूँ। अक्खड़ हूँ, पर दूसरी लड़कियों की ओर नहीं देखूँगा। चलेगा?”

“कपड़े पहनने तक का सलीका नहीं है। तुमसे ज़्यादा ढब तो मेरी माँ को है! उन्हीं से सीख लो हमारे यहाँ कैसे शृंगार करते हैं।“

“भाई हमारी पत्नी में बहुत गुण हैं, पर अच्छा खाना बना पाना उन में से नहीं है।“

“देखो मैं तो नहीं कर पाऊँगा। तुम्हीं दफ्तर से छुट्टी ले कर कर लेना। मुझे बहुत ज़रूरी काम है।“

“रहेंगे तो हम यहीं। तुम्हारा दफ्तर 90 मिनट दूर है तो उसका मैं क्या कर सकता हूँ। मैं रोज़ इतना सफर नहीं कर पाऊँगा। नहीं...  बीच में भी नहीं। तुम्हीं को सफर करना होगा रोज़। बाद में नौकरी यहीं ढूंढ लेना।“

“खानसामा क्यूँ लगायेंगे? तुम 8 बजे तक लौट आती हो। उस के बाद खाना नहीं बना सकती क्या?”

“नहीं मैं नहीं आ पाऊँगा तुम्हारे भाई की शादी में। तुम अकेली चली जाना।“

“सुनो, माँ को कुछ पैसों की ज़रूरत थी तो मैं 2 लाख तुम्हारे खाते से भेज दिए। सब कुछ हमारा ही तो है, और कौन है  भोगने वाला। मैं इकलौती औलाद हूँ।“

“तुम जब चाहो मुझे छोड़ कर जा सकती हो। मैं जो हूँ, वही हूँ। जो नहीं हूँ, वो नहीं बन सकता। सॉरी। शादी से पहले यही बताया था मैंने तुम्हें। अक्खड़ हूँ। “

“तुम्हारा तो दिमाग ही खराब है। मैं दफ्तर में काम करने जाता हूँ, लड़कियों से आशिकी करने नहीं। कैसी शक्की, पागल औरत से पाला पड़ा है! ज़िंदगी बर्बाद कर के रख दी इसने।“

“नहीं मैंने न अंगूठी खरीदी न किसी को दी! गलती लगी है दुकान वालों को। किसी ग्राहक ने फोन नंबर गलत दे दिया होगा।“

“तुम पूरी ही पागल हो क्या? मैं दूसरा बच्चा क्यूँ पैदा करूंगा किसी और के साथ?”

*******

“इस में कहानी कहाँ हुई? ये तो जीवन की गति ही है लाडो! ऐसी बोरिंग सी कहानी कौन पढ़ना चाहेगा!” यामिनी ने मुंह बिचका कर कहा।

यामिनी के अनगिनत गुणों में स्पष्टवादिता भी एक है। और संवेदना में, वेदना से पहले, ‘सम’ का स्थान है – यह भी सब गृहिणियाँ जानती हैं।

हमारे जीवन के ‘सम’ में, वेदना की कोई जगह ही नहीं है। सब कुछ, जीवन की गति भर है। जो कहा नहीं जाता, वह जिया भले ही जाता हो, पर उसका अस्तित्व नहीं होता। इसी लिए, जो होना नहीं चाहिए, उसका होना नहीं, उसका कहना रुकवाया जाता है।

यह वह कहानी है, जो कही नहीं गई - क्यूंकि यामिनी एक सुघड़ गृहिणी है।

*** 

I wondered whether to put this story on this blog or on the other blog that only I read. Finally decided to put it here for now. Lets see if it remains here or goes there. 

Sunday, March 15, 2026

Kshanika

तुम्हारे बिना 

हम जीवंत होते हैं 

तुम्हारे साथ 

जीवित 


Translation: 

When you are not in the room, I am the most vivacious, energetic person in the room. 

But that is performative. 

When you are around, I live my truth - and all the messy emotions that come with being a living person. 

********* 

The thing about a Kshanika (very short poem) is that it is like a slow release time bomb - it hits you a few hours after reading. The good thing? You get to savour it slowly. The not-so-good thing? The impact at the time of reading/listening is not there. 

So, I have now started to explain the Kshanika. Hopefully, that will help.