ki-jaana-main-kaun
This is a random personal blog - covering everything from poetry to politics. Views presented are strictly my own.
Thursday, April 02, 2026
Hamaare baare mein
On doomscrolling
Doomscrolling 3 तरह की होती है :
1. की बनु दुनिया दा? - Worry for the world (war, ecology, ur apocalypse of choice)
2. मेरा क्या होगा कालिया? - I am doomed.
3. बाद में? बाद में सिर्फ... - There is no hope anyway. We are all doomed. In the long run, we are all dead.
So, what's your favourite flavour of doomscrolling?
1. Pineapple Apocalypse (Stings with every bite but we go on nonetheless)
2. Syrupy Self doom (Oh, the sweet, sweet taste of self-predicted failure!)
3. Chocolate No Hope (100% bitter cocoa, and so addictive!)
Thursday, March 26, 2026
Book Review: Khushboo sa bikharna mera by Amita Parsuram 'Meeta'
इस पुस्तक में अक्षर, गज़लें, और नज़्में है। शायरा की अपनी आवाज़ भी है, और बहर भी है।
71 ग़ज़लें, 17 नज़्में, और 45 अकेले शेर 140 पन्नों की किताब में समाए हैं।
लेखिका की आवाज़ उनकी अपनी है। चोट, चोट से निकलता खून, खून पर जमती पपड़ी, और पपड़ी का धीरे धीरे ठीक हो कर गिर जाना - सब कुछ उतनी ही संक्षिप्तता या विस्तार से लिखा गया है, जितना वे लिखना चाहती थीं।
शेर सीधे दिल में उतरते हैं। यहाँ wordplay नहीं है, लफ़्ज़ों की कारीगरी नहीं है, लफ़्ज़ बस कारगर हैं।
सब से अच्छा शेर ये लगा:
रास्ता दूजे का चलते होमंज़िल अपनी ढूंढ रहे हो
एक शेर जो जॉन एलिया की याद दिलाता है:
क्या गज़ब है कि मैं तो ज़िंदा हूँ
और तारीफ हो रही है मेरी
******
कुछ और पसंदीदा शेर:
दफना दिया था जिनको हर सिम्त गूंजती अब
मेरी खामोशियों को आवाज़ मिल गई है
*******
आँखों मे जब सपने चमके
जो ओझल थे रस्ते चमके
****
खुद से हार चुका जो मीता
और भला क्या खो सकता है
**
दिल ने जब जब ख्वाब बुने हैं
ताबीरों ने स्वांग रचे हैं
रिश्तों के ताने बाने से
हमने क्या क्या जाल बुने हैं
*******
रात की चादर ओढ़ने वालों,
ऐसे भी क्या दिन रुकते हैं?
**
दिल में उतरे लहज़ा लहज़ा
दिल से उतरे बस इक पल में
मानो तो सच हो जाता है
रब मिल जाता है पीपल में
*******
जब खुद निकल ना पाया वो दुनिया की कैद से
खोला कफ़स को और परिंदा उड़ा गया
**
उस से दूर बहुत रहना था
जिस दुनिया में उलझी हूँ मैं
******
Friday, March 20, 2026
Short Story
“कभी कभी टूटे दिल का दर्द ऐसे रिसता है, जैसे नाली के किनारे कट कर पड़ी लाश में से खून।
और कभी, अंदर किसी गुम चोट
से धीरे धीरे पड़ते नील जैसा।
मेरा न ये था न वो था।
अंदर खून बह रहा था, पर बाहर नील भी नहीं दिख रहा था। बाद में सुना, आँतें चिपक सी
गईं थीं तो डॉक्टरों ने ऐसे ही छोड़ दीं। अभी भी जुड़ी हुई हैं शायद। खून का रिश्ता
हो गया है उनका एक दूसरे से।“
“धत! कहानी कोई ऐसे शुरू
करता है क्या? कहानी शुरू से शुरू कर के, अंत तक ले जानी चाहिए। अंत के बाद से
शुरू कर के, शुरुआत तक खींचने का क्या तुक है?” यामिनी हंस कर बोली।
कहने को वह सरल सी गृहिणी
थी। और इसी लिए, उसे मानवीय संवेदना की गहरी पहचान थी। उसने मेरे पूरे कथन में जो
खून-वून की बात थी, उसे अनदेखा कर दिया। जैसे लोग आत्महत्या का प्रयास करने वाले
परिजन से कभी आत्महत्या के बारे में बात नहीं करते। “खाना खाया?” , “दफ्तर गए थे?”
“डॉक्टर से मिल लिए?” – इस तरह की बातें करते हैं। मानो दर्द और आत्महत्या छूत की
बीमारी हों, जो बोलने भर से लग सकती हैं।
मैंने प्रयास किया, पर
शुरू से शुरू करने जितना कुछ था ही नहीं। शुरुआत हर प्रेम कहानी की एक सी होती है – आँखों-आँखों में बातें, पहले एक
दूसरे से नज़रें चुराना फिर हार कर इकरार कर लेना... वगैरह वगैरह।
कहानी उस के बाद शुरू होती
है।
“तुम्हें तुम्हारी खूबसूरती
के लिए प्रेम नहीं किया, तुम्हारे मन के लिए किया है।“
“मैं हमेशा तुम से सच बोलूँगा।
रोमांटिक नहीं हूँ, पर सच्चा हूँ। अक्खड़ हूँ, पर दूसरी लड़कियों की ओर नहीं देखूँगा।
चलेगा?”
“कपड़े पहनने तक का सलीका नहीं
है। तुमसे ज़्यादा ढब तो मेरी माँ को है! उन्हीं से सीख लो हमारे यहाँ कैसे शृंगार करते
हैं।“
“भाई हमारी पत्नी में बहुत
गुण हैं, पर अच्छा खाना बना पाना उन में से नहीं है।“
“देखो मैं तो नहीं कर पाऊँगा।
तुम्हीं दफ्तर से छुट्टी ले कर कर लेना। मुझे बहुत ज़रूरी काम है।“
“रहेंगे तो हम यहीं। तुम्हारा
दफ्तर 90 मिनट दूर है तो उसका मैं क्या कर सकता हूँ। मैं रोज़ इतना सफर नहीं कर पाऊँगा।
नहीं... बीच में भी नहीं। तुम्हीं को सफर करना
होगा रोज़। बाद में नौकरी यहीं ढूंढ लेना।“
“खानसामा क्यूँ लगायेंगे? तुम
8 बजे तक लौट आती हो। उस के बाद खाना नहीं बना सकती क्या?”
“नहीं मैं नहीं आ पाऊँगा तुम्हारे
भाई की शादी में। तुम अकेली चली जाना।“
“सुनो, माँ को कुछ पैसों की
ज़रूरत थी तो मैं 2 लाख तुम्हारे खाते से भेज दिए। सब कुछ हमारा ही तो है, और कौन है
भोगने वाला। मैं इकलौती औलाद हूँ।“
“तुम जब चाहो मुझे छोड़ कर जा
सकती हो। मैं जो हूँ, वही हूँ। जो नहीं हूँ, वो नहीं बन सकता। सॉरी। शादी से पहले यही
बताया था मैंने तुम्हें। अक्खड़ हूँ। “
“तुम्हारा तो दिमाग ही खराब
है। मैं दफ्तर में काम करने जाता हूँ, लड़कियों से आशिकी करने नहीं। कैसी शक्की, पागल
औरत से पाला पड़ा है! ज़िंदगी बर्बाद कर के रख दी इसने।“
“नहीं मैंने न अंगूठी खरीदी
न किसी को दी! गलती लगी है दुकान वालों को। किसी ग्राहक ने फोन नंबर गलत दे दिया होगा।“
“तुम पूरी ही पागल हो क्या?
मैं दूसरा बच्चा क्यूँ पैदा करूंगा किसी और के साथ?”
*******
“इस में कहानी कहाँ हुई? ये
तो जीवन की गति ही है लाडो! ऐसी बोरिंग सी कहानी कौन पढ़ना चाहेगा!” यामिनी ने मुंह
बिचका कर कहा।
यामिनी के अनगिनत गुणों में
स्पष्टवादिता भी एक है। और संवेदना में, वेदना से पहले, ‘सम’ का स्थान है – यह भी सब
गृहिणियाँ जानती हैं।
हमारे जीवन के ‘सम’ में, वेदना
की कोई जगह ही नहीं है। सब कुछ, जीवन की गति भर है। जो कहा नहीं जाता, वह जिया भले
ही जाता हो, पर उसका अस्तित्व नहीं होता। इसी लिए, जो होना नहीं चाहिए, उसका होना नहीं,
उसका कहना रुकवाया जाता है।
यह वह कहानी है, जो कही नहीं
गई - क्यूंकि यामिनी एक सुघड़ गृहिणी है।
***
I wondered whether to put this story on this blog or on the other blog that only I read. Finally decided to put it here for now. Lets see if it remains here or goes there.
Sunday, March 15, 2026
Kshanika
तुम्हारे बिना
हम जीवंत होते हैं
तुम्हारे साथ
जीवित
Translation:
When you are not in the room, I am the most vivacious, energetic person in the room.
But that is performative.
When you are around, I live my truth - and all the messy emotions that come with being a living person.
*********
The thing about a Kshanika (very short poem) is that it is like a slow release time bomb - it hits you a few hours after reading. The good thing? You get to savour it slowly. The not-so-good thing? The impact at the time of reading/listening is not there.
So, I have now started to explain the Kshanika. Hopefully, that will help.
Thursday, March 12, 2026
मुझे इश्क है पलाश से
मुझे इश्क है
पलाश से
तुम हँसोगे।
पलाश भी कोई इश्क करने जैसा पेड़ है?
है।
सुनो तो।
पलाश के पत्ते
और फूल
कभी साथ नहीं आते
भरे पूरे पेड़ पर
एक भी फूल नहीं
और खड़े ठूंठ पर
सिर्फ सुर्ख फूल।
पलाश की किस्मत में वह भी नहीं है, जो हर पेड़ को स्वत: ही मिल जाता है - पत्तों की परवरिश में फूलों का सुख।
पत्ते फूलों से नहीं मिलते
फूल पत्तों को नहीं देख पाते
केवल तना साक्षी है
कि दोनों का होना सत्य है
पलाश का तना
अपने अस्तित्व को
अपने मन में उठाए चलता है
आह नहीं भरता
पलाश
बाबा सा है
बच्चों की किच किच
और माँ की शिकायतों का
अकेला साझेदार।
अपने सीने की जलन को
भरे पूरे वसंत में
जकरन्दा और गुलाब के समकक्ष
पुर-गुरूर पहनने से
नहीं डरता पलाश।
मुझे
पलाश सा होना है एक दिन।
धीरे से
भीज कर
या पिस कर
बन जाता है
गुलाल
सब को
अपना-सा कर जाता है
जा कर
और भी अपना हो जाता है
प्रेम सा है
पलाश
Thursday, March 05, 2026
Random original quotes
Tuesday, February 10, 2026
The crash that took Homi Bhabha
https://maddy06.blogspot.com/2026/02/air-india-101-1966-many-mysteries-at.html
I haven't read a lot about this crash, but this is a very impressive crasher (pun not intended) on the subject.
Recommended read!
Sometimes, I do say good stuff
This was posted on a reading group by the admin:
My response:
Book Summaries have been around since at least 2001. The issue is not that book summaries are available.
It is with the core idea that authors and editors waste words. They don't. Everything that is in the book deserved to be there.
So when you read a distillation, you get the essence the same way that tea leaves are the essence of tea. They are, but without the extras, they are quite... useless.
Imagine Thomas Hardy without the description. Rashmirathi without the rhyming. Jane Austen without the love letters. Poirot without "Eh, Bien." Sherlock without 221B. Premchand without "Kisi prakaar koi heela na hua."
*******
In other news, mental health has some good days now.