“कभी कभी टूटे दिल का दर्द ऐसे रिसता है, जैसे नाली के किनारे कट कर पड़ी लाश में से खून।
और कभी, अंदर किसी गुम चोट
से धीरे धीरे पड़ते नील जैसा।
मेरा न ये था न वो था।
अंदर खून बह रहा था, पर बाहर नील भी नहीं दिख रहा था। बाद में सुना, आँतें चिपक सी
गईं थीं तो डॉक्टरों ने ऐसे ही छोड़ दीं। अभी भी जुड़ी हुई हैं शायद। खून का रिश्ता
हो गया है उनका एक दूसरे से।“
“धत! कहानी कोई ऐसे शुरू
करता है क्या? कहानी शुरू से शुरू कर के, अंत तक ले जानी चाहिए। अंत के बाद से
शुरू कर के, शुरुआत तक खींचने का क्या तुक है?” यामिनी हंस कर बोली।
कहने को वह सरल सी गृहिणी
थी। और इसी लिए, उसे मानवीय संवेदना की गहरी पहचान थी। उसने मेरे पूरे कथन में जो
खून-वून की बात थी, उसे अनदेखा कर दिया। जैसे लोग आत्महत्या का प्रयास करने वाले
परिजन से कभी आत्महत्या के बारे में बात नहीं करते। “खाना खाया?” , “दफ्तर गए थे?”
“डॉक्टर से मिल लिए?” – इस तरह की बातें करते हैं। मानो दर्द और आत्महत्या छूत की
बीमारी हों, जो बोलने भर से लग सकती हैं।
मैंने प्रयास किया, पर
शुरू से शुरू करने जितना कुछ था ही नहीं। शुरुआत हर प्रेम कहानी की एक सी होती है – आँखों-आँखों में बातें, पहले एक
दूसरे से नज़रें चुराना फिर हार कर इकरार कर लेना... वगैरह वगैरह।
कहानी उस के बाद शुरू होती
है।
“तुम्हें तुम्हारी खूबसूरती
के लिए प्रेम नहीं किया, तुम्हारे मन के लिए किया है।“
“मैं हमेशा तुम से सच बोलूँगा।
रोमांटिक नहीं हूँ, पर सच्चा हूँ। अक्खड़ हूँ, पर दूसरी लड़कियों की ओर नहीं देखूँगा।
चलेगा?”
“कपड़े पहनने तक का सलीका नहीं
है। तुमसे ज़्यादा ढब तो मेरी माँ को है! उन्हीं से सीख लो हमारे यहाँ कैसे शृंगार करते
हैं।“
“भाई हमारी पत्नी में बहुत
गुण हैं, पर अच्छा खाना बना पाना उन में से नहीं है।“
“देखो मैं तो नहीं कर पाऊँगा।
तुम्हीं दफ्तर से छुट्टी ले कर कर लेना। मुझे बहुत ज़रूरी काम है।“
“रहेंगे तो हम यहीं। तुम्हारा
दफ्तर 90 मिनट दूर है तो उसका मैं क्या कर सकता हूँ। मैं रोज़ इतना सफर नहीं कर पाऊँगा।
नहीं... बीच में भी नहीं। तुम्हीं को सफर करना
होगा रोज़। बाद में नौकरी यहीं ढूंढ लेना।“
“खानसामा क्यूँ लगायेंगे? तुम
8 बजे तक लौट आती हो। उस के बाद खाना नहीं बना सकती क्या?”
“नहीं मैं नहीं आ पाऊँगा तुम्हारे
भाई की शादी में। तुम अकेली चली जाना।“
“सुनो, माँ को कुछ पैसों की
ज़रूरत थी तो मैं 2 लाख तुम्हारे खाते से भेज दिए। सब कुछ हमारा ही तो है, और कौन है
भोगने वाला। मैं इकलौती औलाद हूँ।“
“तुम जब चाहो मुझे छोड़ कर जा
सकती हो। मैं जो हूँ, वही हूँ। जो नहीं हूँ, वो नहीं बन सकता। सॉरी। शादी से पहले यही
बताया था मैंने तुम्हें। अक्खड़ हूँ। “
“तुम्हारा तो दिमाग ही खराब
है। मैं दफ्तर में काम करने जाता हूँ, लड़कियों से आशिकी करने नहीं। कैसी शक्की, पागल
औरत से पाला पड़ा है! ज़िंदगी बर्बाद कर के रख दी इसने।“
“नहीं मैंने न अंगूठी खरीदी
न किसी को दी! गलती लगी है दुकान वालों को। किसी ग्राहक ने फोन नंबर गलत दे दिया होगा।“
“तुम पूरी ही पागल हो क्या?
मैं दूसरा बच्चा क्यूँ पैदा करूंगा किसी और के साथ?”
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“इस में कहानी कहाँ हुई? ये
तो जीवन की गति ही है लाडो! ऐसी बोरिंग सी कहानी कौन पढ़ना चाहेगा!” यामिनी ने मुंह
बिचका कर कहा।
यामिनी के अनगिनत गुणों में
स्पष्टवादिता भी एक है। और संवेदना में, वेदना से पहले, ‘सम’ का स्थान है – यह भी सब
गृहिणियाँ जानती हैं।
हमारे जीवन के ‘सम’ में, वेदना
की कोई जगह ही नहीं है। सब कुछ, जीवन की गति भर है। जो कहा नहीं जाता, वह जिया भले
ही जाता हो, पर उसका अस्तित्व नहीं होता। इसी लिए, जो होना नहीं चाहिए, उसका होना नहीं,
उसका कहना रुकवाया जाता है।
यह वह कहानी है, जो कही नहीं
गई - क्यूंकि यामिनी एक सुघड़ गृहिणी है।
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I wondered whether to put this story on this blog or on the other blog that only I read. Finally decided to put it here for now. Lets see if it remains here or goes there.