पीड़ा का अपना कोई पदार्थ या भार नहीं होता।
वह जिस हाथ में होती है, उसके आधार पर उसका पदार्थ और भार निर्धारित हो जाता है।
मेरे हाथ में रखी मेरी पीड़ा युरेनीअम की होती है - बहुत, बहुत भारी, और बहुत, बहुत विरली, rare, दुनिया में सबसे अलग।
किसी मित्र के हाथ में जा कर, सोने की हो जाती है - कीमती, युरेनीअम से कम भारी, थोड़ी सी कम rare, पर अब भी असाधारण।
प्रेम के हाथ में पड़ते ही, मोती बन जाती है। वह देख पाता है, वह सारी पीड़ा, जो इस पीड़ा से भी पहले सही गई। उसके हाथों में, दुख भी सुंदर हो जाता है।
रिश्तेदारों के हाथ में अपनी पीड़ा हो जाती है ऊन की गेंद - एक बहुत आम सी, रोजमर्रा की चीज़, जिस से या तो कहानियाँ बुनी जा सकती हैं, या जिसे फरोल-फरोल कर उस से खेला जा सकता है - अगला खिलौना मिलने तक।
और किसी बेकदरे के हाथ में, पीड़ा बन जाती है कमरे के कोने की धूल - जिसे केवल अनदेखा किया जाना चाहिए। जिस पर हाथ भी नहीं फेरना चाहिए। न वज़न रह जाता है, न मोल। केवल उपेक्षा।
