Tuesday, December 20, 2022

Thoughts from Meditation

कभी सोचा है, कि संतों के नाम के पीछे आनंद क्यूँ लगता है? विवेकानंद? परमानंद? रामानन्द? 

क्योंकि ध्यान, साधना से आगे जो है, सो आनंद है। 

एक समय के बाद, सब कुछ सहज हो जाता है। सब कुछ प्रेम से  ओत-प्रोत हो जाता है। 

तब जो अनुभूति होती है, वह केवल आनंद ही है। 

उस स्थान पर पहुंचना कुछ कुछ एवरेस्ट के शीर्ष पर पहुँचने जैसा है - वो ऐसे कि इस के ऊपर जाने के लिए कुछ नहीं है। इस लिए नहीं कि मार्ग नहीं है - बल्कि इसलिए कि महत्वाकांक्षा ही नहीं है। 

वहाँ से ऊपर कुछ नहीं है, तो वहाँ से नीचे भी कुछ नहीं है। जो आनंद को प्राप्त होता है, उसे तृप्ति मिलती है। और जिस में तृप्ति है, उस में किस चीज़ की पिपासा? क्या यत्न? किस प्रयोजन से? 

ध्यान साधना बनता है, साधना बनती है मुक्ति। पर मुक्ति  की परिभाषा क्या है? धरती पर, मुक्ति का संकेत है, लालसा की अनुपस्थिति - तृप्ति का बोध। 

यह तृप्ति देती है आनंद। इस तृप्ति से जिस सुख की अनुभूति होती है, वह है आनंद। 

आनंद से आगे कुछ नहीं है। इसलिए, जिस व्यक्ति को बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है, उसके नाम के पीछे धरती का कोई मार्का कोई मानी नहीं रखता - न उसके पिता का नाम, न प्रदेश का, न जाति का। उसकी पहचान बन जाता है, केवल वह आनंद, जो उसकी उपस्थिति में अनुभव होता है। 


Have you ever wondered why the names of saints in India end with Anand? Vivekananda? Ramananda? 

It is because Ananda is the end of the spiritual journey. 

Let me explain. 

Dhyana (Focus) leads to Sadhna (the disciplined pursuit of a goal). 

Sadhana, in turn, leads to mukti (Freedom). 

But, how do we experience Mukti in this world? 

On Earth, Mukti is the absence of attachment, the absence of desire. 

The absence of desire, we also know as contentment, a state of peace in which there is absolute completeness. Nothing is amiss. Nothing is in the wrong place. Everything is exactly as it should be. 

That state is called Ananda - joy. 

It cannot be described or explained as well as it can be experienced. 

It is at this point that one feels that one has "come home". It marks the end of pursuit and the beginning of eternal bliss and joy in what one has. 


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