प्यार न, swimming pool के जैसा होता है। लगता है, इतना सा तो पानी है, वो तो रही ज़मीन।
इस में तो आराम से सीधे खड़े हो जाएंगे। गहराई कहाँ है?
फिर
हम उस में पैर रखते हैं और गोता खाने लगते
हैं। तब सच्चाई समझ में आती है। इस तरण ताल में, किसी को तैरना नहीं आता। क्यूंकि
तुम कितने भी पारंगत खिलाड़ी रहे हो, ये तरण ताल हमेशा उस से ज़्यादा गहरा निकलता है।
और इसे नियति समझने वाले?
4 comments:
इसे नियति समझने वाले इसी में डूबना पसंद करते हैं । और प्रेम में डूबा इंसान स्वतः ऊपर उठने लगने है ।
Sudha ji: मेरा भी यही मानना है - कि प्रेम में समर्पण करने वाले वैसे ही उठते हैं, जैसे पानी में समर्पण करने वाले। पानी हमें डूबने नहीं देता। प्रेम भी। चिट्ठे पर आने के लिए हृदय से आभार।
प्रेम तो निज स्वभाव है, इससे भागकर भी कहाँ जाएँगे
true!!
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