Saturday, July 25, 2026

मेरे सीने में एक खलिश सी है 

सुघड़ खलिश है, अनुभवी है 

न भरती है, न घटती है, न रह पाती है अनछुई 

सांस दर सांस बीतते हैं हफ्ते, महीने, साल 

घड़ी की टिकटिक 

धीरे धीरे 

हो गई है बेमानी। 


ये खलिश 

घर के मेधावी प्रेत सी है 

जकड़ लेती है 

कभी अलमारी को, जिस में 

रिसाले रखे थे उन दोस्तों के 

जिन्हें अब whatsapp text भी लिखने नहीं आते 

कभी रसोई घर की उस कड़छी को 

जिस से दाल बनाई थी

किसी खास इंसान के साथ 


हर चीज़, हर कोना, हर शब्द 

कुछ देर के लिए 

खो देते हैं अपना मानी 

और बन जाते हैं खलिश 

फिर ये 

कूद कर आ बैठती है 

मन के भीतर - अपने कोठर में 

क्यूंकि 

घर से दूर 

प्रेत भी नहीं रह पाते। 


 

1 comment:

Anita said...

शायद यह ख़लिश ही आदमी के जीवन जो जीवन बनाती है, उसे आगे बढ़ाती है, धकेलती है कि बस यही नहीं, जीवन में कुछ और भी है जिसकी तलाश करनी है