मेरे सीने में एक खलिश सी है
सुघड़ खलिश है, अनुभवी है
न भरती है, न घटती है, न रह पाती है अनछुई
सांस दर सांस बीतते हैं हफ्ते, महीने, साल
घड़ी की टिकटिक
धीरे धीरे
हो गई है बेमानी।
ये खलिश
घर के मेधावी प्रेत सी है
जकड़ लेती है
कभी अलमारी को, जिस में
रिसाले रखे थे उन दोस्तों के
जिन्हें अब whatsapp text भी लिखने नहीं आते
कभी रसोई घर की उस कड़छी को
जिस से दाल बनाई थी
किसी खास इंसान के साथ
हर चीज़, हर कोना, हर शब्द
कुछ देर के लिए
खो देते हैं अपना मानी
और बन जाते हैं खलिश
फिर ये
कूद कर आ बैठती है
मन के भीतर - अपने कोठर में
क्यूंकि
घर से दूर
प्रेत भी नहीं रह पाते।
1 comment:
शायद यह ख़लिश ही आदमी के जीवन जो जीवन बनाती है, उसे आगे बढ़ाती है, धकेलती है कि बस यही नहीं, जीवन में कुछ और भी है जिसकी तलाश करनी है
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