पुस्तक मेले से ढूंढ धाँध कर लाई किताब का अपना दंभ होता है। कोई नाम नहीं, कोई समीक्षा नहीं। मन ने शब्दों को चुना होता है।
घर आ कर जब ये शब्द पढ़ कर मन से वाह! निकलती है, तो वह कुछ कुछ ऐसी होती है जैसे मन पसंद चाय की चुस्की!
कविता की किताब अपनी बात खुद कह सकती है। उसे कहने देते हैं ...
खुद ही प्यासे हैं समंदर तो फकत नाम के हैं
भूल जाओ कि बड़े लोग किसी काम के हैं
दस्तकें खास उसी वक़्त में देता है कोई
चार-छ: पल जो मेरी उम्र में आराम के हैं
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वो संग दिल जो अभी रो पड़ा तो इल्म हुआ
कि उस पहाड़ के सीने में एक झरना है
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अचानक रुक गई तो देखती हूँ
मेरे चलने से रिश्ता चल रहा था
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मैं जागती हूँ मुझे काम कुछ नहीं आखिर
वो सो गया है उसे काम पर निकलना था
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ज़िंदगी भर जमीन का खाया
मरने तक आसमान को सोचा
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हमें नसीब मिला है किसी जज़ीरे का
खुशी के बीच में रह कर उदास रहना है
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तुम्हारी धमकियों पर जां सदके
दिले बर्बाद को अब क्या ही खतरा
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ईमान ले कर आई हूँ बाजार में जरूर
पर बेचना नहीं है मुझे देखना है भाव
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थोड़ी सी दिल में क्या जगह मांगी
वो मुहाजिर समझ रहे हैं मुझे
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हम अंधेरे में रहने वाले लोग
गिनते रहते हैं गिनती 100 तक की
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ख्वाब सब मेरे मुकम्मल हो गए
नींद भी तेरे बिना आने लगी
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मेरी उदास मिजाज़ी पे मत तरस खाओ
मैं वो ग़ज़ल हूँ जिसे सब की दाद हासिल है
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