इस पुस्तक में अक्षर, गज़लें, और नज़्में है। शायरा की अपनी आवाज़ भी है, और बहर भी है।
71 ग़ज़लें, 17 नज़्में, और 45 अकेले शेर 140 पन्नों की किताब में समाए हैं।
लेखिका की आवाज़ उनकी अपनी है। चोट, चोट से निकलता खून, खून पर जमती पपड़ी, और पपड़ी का धीरे धीरे ठीक हो कर गिर जाना - सब कुछ उतनी ही संक्षिप्तता या विस्तार से लिखा गया है, जितना वे लिखना चाहती थीं।
शेर सीधे दिल में उतरते हैं। यहाँ wordplay नहीं है, लफ़्ज़ों की कारीगरी नहीं है, लफ़्ज़ बस कारगर हैं।
सब से अच्छा शेर ये लगा:
रास्ता दूजे का चलते होमंज़िल अपनी ढूंढ रहे हो
एक शेर जो जॉन एलिया की याद दिलाता है:
क्या गज़ब है कि मैं तो ज़िंदा हूँ
और तारीफ हो रही है मेरी
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कुछ और पसंदीदा शेर:
दफना दिया था जिनको हर सिम्त गूंजती अब
मेरी खामोशियों को आवाज़ मिल गई है
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आँखों मे जब सपने चमके
जो ओझल थे रस्ते चमके
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खुद से हार चुका जो मीता
और भला क्या खो सकता है
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दिल ने जब जब ख्वाब बुने हैं
ताबीरों ने स्वांग रचे हैं
रिश्तों के ताने बाने से
हमने क्या क्या जाल बुने हैं
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रात की चादर ओढ़ने वालों,
ऐसे भी क्या दिन रुकते हैं?
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दिल में उतरे लहज़ा लहज़ा
दिल से उतरे बस इक पल में
मानो तो सच हो जाता है
रब मिल जाता है पीपल में
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जब खुद निकल ना पाया वो दुनिया की कैद से
खोला कफ़स को और परिंदा उड़ा गया
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उस से दूर बहुत रहना था
जिस दुनिया में उलझी हूँ मैं
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