Monday, September 11, 2023

Sapne

लेकर अपने अपने हिस्से के सपने 

सब गुम हैं 

अपने ही किसी खुद के साथ। 


कोई उन सपनों को दिखा रहा है 

उम्मीद की नई धूप 


कोई कर रहा उन पर से 

शहर के धुएँ की परत साफ! 


कोई भागे चला जा रहा है 

उनके संग 

बर्फ के उस पार। 


पर तुम अभी भी 

कांच के इन टूटे टुकड़ों को 

लगा रहे हो अपने ही दर-ओ-दीवार पर 

करेंगे तुम्हें ही लहूलुहान 

और उसे भी 

जो दूर गली में 

देख रहा है एकटक 

अपने सपने में 

तुम्हें। 

- poet unknown 


- I have grown more fond of this poem in the recent past bcs i read it everyday. 


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