मुझे युवा लेखकों की पुस्तकें पढ़ना अच्छा लगता है. नई सोच, नई अभिव्यक्ति, नए एहसास।
पर कुछ पुस्तकों को पढ़ कर लगता है, कि लेखक को और पढ़ना चाहिए था। इस साल की ये दूसरी ऐसी किताब है जिसे पढ़ कर लगा लेखक को प्रकाशित होने से पहले पढ़ना चाहिए था।
ऐसा नहीं है कि आदित्य ने पढ़ा नहीं है। बहुत सी सुंदर कविताओं के अंश इस किताब में यह प्रमाणित करते हैं कि आदित्य रहबर ने बहुत पढ़ा है, और बहुत समझा है।
पर इन पत्रों में एक चीज नहीं है - सहर की आवाज़। एक भी पत्र में यह नहीं आता - "तुमने अपनी सहेली के बारे में बताया था, उसका क्या हुआ?"
पहले लगा शायद एकतरफा प्रेम है, सहर का कोई योगदान नहीं है। फिर पता चला, नहीं, मिलते हैं, बात भी होती है, तो बात एकतरफा नहीं है। किसी से प्रेम कर के, उसके जीवन में थोड़ी सी भी रुचि ना होना, उसके जीवन, उसके अवसाद के बारे में एक बार भी न पूछना, ये भी न पूछना कि आजकल उखड़ी-उखड़ी रहती हो, क्या हुआ है?
- यह इस पुस्तक की पहली खामी है। पत्र दो लोगों के बीच का सिलसिला हैं। यदि पत्राचार एकतरफा भी हो, तो भी दूसरे का व्यक्तित्व उस पत्र में आना आवश्यक है। स्वाभाविक भी। आ ही जाता है। यहाँ नहीं आता। यहाँ सहर किसी अवसाद हेल्पलाइन सी लगती है - केवल लेखक के मन की बातें सुनने के लिए। सहर इन पत्रों में नहीं है। सहर के बदले क्षमा होती, मधु होती, तो भी ऐसे ही होते ये पत्र - केवल लेखक जैसे।
बहुत समय पहले मैंने 2 कविताएँ लिखी थीं प्रेम पर। कालांतर में, बहुत सारे टूटे बिखरे रिश्तों का राज़ उन दो कविताओं में पाया।
https://ki-jaana-main-kaun.blogspot.com/2019/09/prem.html - ये वो रिश्ते हैं जो टूट जाते हैं।
https://ki-jaana-main-kaun.blogspot.com/2019/09/blog-post.html - ये वो रिश्ते हैं जो शायद निभ जाएँ, क्यूंकि इन में कोई अपने लिए नहीं, दोनों के लिए सोचता है।
पुस्तक की दूसरी खामी शायद सभी के लिए बुरी नहीं है। हर लेखक का अपना एक अंदाज़ होता है और शायद यह अंदाज़ कुछ पाठकों, खासकर युवा पाठकों को, अच्छा लगे। पर ये पत्र बहुत लंबे हैं। जो बातें धीमे से कह देनी चाहिए, वे संदर्भ सहित व्याख्या की तरह कही गई हैं। यह व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की बात है, मुझे पसंद नहीं आया। किसी और को अवश्य आएगा।
पुस्तक में अच्छा क्या है? कुछ-कुछ पंक्तियाँ। कुछ विचार। गाँव और शहर के कमरों का विवरण। पर सब से अच्छा लगा, "अंत में, तुम्हारा वही जो तुम मानती हो"
- इस हस्ताक्षर में जितना अवसाद है, उतना ही समर्पण भी है। हर रिश्ते का यही नियम है - हम वही हो सकते हैं, जो सामने वाला हमें मानता है, और सामने वाला वही हो सकता है, जो हम उसे मानते हैं।
हर पत्र का एक नाम भी है। सच कहूँ तो मैंने पढ़ा नहीं। जरूरत ही नहीं थी। हर पत्र अपने आप में पूरा है। नाम की कोई जरूरत नहीं।
अंत में, आदित्य रहबर को बहुत शुभकामनाएँ। और लिखिए।
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