Sunday, December 15, 2019

Pyaaraa/ Piece

तुम तक पहुँचने के
इस सफर पे जब निकला था 
बहुत मरहले आये. 

हर मरहले को मैंने 
एक मील का पत्थर मान लिया। 

उन चालों को चलते चलते 
मैं बन गया 
जीवन की शतरंज का
एक बहुत सफल प्यादा। 

बहुत सालों के बाद समझा हूँ 
कि 'पंज' हों, 
या 'वह एक' 
प्यादा 
प्यारा नहीं बन सकता। 

* पंज प्यारे सिखों के दशम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के द्वारा अमृत छकाए गए, पहले खालसे थे. गृ गोबिंद सिंह जी ने भीड़ को ललकारा था - मरने के लिए कौन तैयार है? तब ये ५ जांबाज़ लोग मरने के लिए आगे आये थे. इस प्रकार खालसा पंथ की स्थापना हुई. पंज प्यारे सिखों में प्रेरणा और अडिग वीरता के चिन्ह हैं. 
"वह एक" यहां पर चुने हुए साथी के लिए प्रयुक्त है. 

When I started
this odyssey
to reach you -
At first
there were
many, many obstacles.

I treated each one
as a milestone
and did whatever it took
to overcome.

And that is how
I became
a really adept piece
on the board of life's chess.

It was only much later
that I realised
that a piece on the chess board
cannot be
a piece of
someone's heart.



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