Monday, March 25, 2013

वो हमेशा वहीँ दिखती थी। एक पत्थर पर बैठी हुइ. उस के पास की जगह, हमेशा खाली हुआ करती थी . और उस की आँखों में , हमेशा इंतज़ार .

फिर एक दिन, एक अजूबा हुआ .
उस के पास वाली जगह, खाली नहीं थी . वहां कोई बैठा हुआ था.

पर "उस" की जगह खाली थी .

और जो उस के साथ वाली जगह में बैठा था, उस की आँखों में इंतज़ार नहीं था. उस की आँखों में एक खला थी . उन आँखों की खला , जिन्हें अभी मालूम हुआ हो, कि उनके पैरों ने आने में बहुत देर कर दी .

3 comments:

Onkar said...

Brief, but good post

Mridula Harshvardhan said...

awesome

How do we know said...

Onkar sir: thank you!

Naaz: :) yeah.. pain is all familiar.