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Sunday, November 02, 2025

Khaleel Dhantejwi ka sher

 किसी भी रिश्ते को नज़दीक से न देखो तुम

पहाड़ दूर से अच्छा दिखाई देता है

 - Khaleel Dhantejwi 

Monday, October 06, 2025

Ghazal by Ajmal Ajmali

 वक़्त-ए-सफ़र क़रीब है बिस्तर समेट लूँ

बिखरा हुआ हयात का दफ़्तर समेट लूँ


फिर जाने हम मिलें न मिलें इक ज़रा रुको

मैं दिल के आइने में ये मंज़र समेट लूँ


ग़ैरों ने जो सुलूक किया उसका क्या गिला

फेंके हैं दोस्तों ने जो पत्थर समेट लूँ


कल जाने कैसे होंगे कहाँ होंगे घर के लोग

आँखों में एक बार भरा घर समेट लूँ


तार-ए-नज़र भी ग़म की तमाज़त से ख़ुश्क है

वो प्यास है मिले तो समुंदर समेट लूँ


'अजमल' भड़क रही है ज़माने में जितनी आग

जी चाहता है सीने के अंदर समेट लूँ


Ajmal Ajmali

Wednesday, May 21, 2025

Ashar from the poetry group

 मंज़िलें क्या बताएँ मैं क्या हूँ

ज़िंदगी का उदास रस्ता हूँ


काम आई न कुछ शनासाई

शहर की भीड़ में अकेला हूँ


ख़ार-ओ-ख़स ही सही मगर यारो

मैं भी सहन-ए-चमन का हिस्सा हूँ


आप अपनी सुनाइए 'मासूम'

मेरी क्या पूछते हैं अच्छा हूँ


~ मासूम शर्क़ी


**** 

There is a song in a Hindi film that is also a ghazal: 

यूं हसरतों के दाग मुहब्बत में धो लिए 

खुद दिल से दिल की बात कही, और रो दिए 

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And a Ghalib sher that comes to mind: 

कब से हूँ क्या बताऊँ जहां-ने-खराब में 

शब और हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में 

***** 


Friday, March 21, 2025

Akele Sher

जितना सुधार दिया है खुद को मैंने 

उतना तो मैं खराब भी नहीं था 


जिस बेरहमी से तोड़ा है ज़िंदगी तूने 

उतना बड़ा तो मेरा ख्वाब भी नहीं था 

- From the Insta of Saima123. Don't know the name of the poet. 

Monday, March 17, 2025

Meena Kumari ki Shayari - 1

मांगी - तांगी हुई सी कुछ बात 

दिन की झोली में भीख की रातें 

मेरी दहलीज़ पर भी लाई थी 

ज़िंदगी दे गई है सौगातें 

************ 

चाँद तन्हा है आसमान तन्हा 

दिल मेरा है कहाँ कहाँ तन्हा 


बुझ गई आस, छुप गया तारा 

थरथराता रहा धुआँ तन्हा 


ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं 

जिस्म तन्हा है और जां तन्हा 


हमसफ़र  कोई 'गर कोई मिले भी कहीं 

दोनों चलते रहें यहाँ तन्हा 


जलती बुझती सी रोशनी के पड़े 

सिमटा सिमटा सा इक मकां तन्हा 


राह देखा करेगा सदियों तक 

छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा 

*********** 

टुकड़े टुकड़े दिन बीता, धज्जी धज्जी रात मिली 

जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली 


रिमझिम रिमझिम बूंदों में, ज़हर भी है और अमृत भी 

आँखें हंस दीं, दिल रोया, ये अच्छी बरसात मिली 


जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज सुनी 

जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली 


मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर 

दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली 


होंठों तक आते- आते, जाने कितने रूप भरे 

जलती बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली 

********** 

आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता 

जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता 


जब ज़ुल्फ़ की कालिख में गम जाए कोई राही 

बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता 


बहते हुए आँसू ने कहा आँखों से थम कर 

जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता 

(How much I LOVE this sher) 


दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती 

साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता 

******* 

बैठे हैं रास्ते में बयाबान-ए- दिल सजा कर 

शायद इसी तरफ से इक दिन बहार गुज़रे 

**** 

मेरी तरह सम्हाले कोई जो दर्द जानूँ 

इक बार दिल से हो कर परवरदिगार गुज़रे 

******* 



 

  

Sunday, February 02, 2025

Urdu poetry from the old diary

 कुछ ग़म मेरे दिल से सम्हाले नहीं जाते 

आँसू भी उन्हें साथ बहा ले नहीं जाते 


ग़म हो के खुशी आँखों में आ जाते हैं आँसू 

दुख सुख में मेरे चाहने वाले नहीं जाते 


ये वक़्त फक्त पाँव के छालों का हैं मरहम 

पड़ जाते हैं जो दिल में वो छाले नहीं जाते 


एक वक़्त था, पी जाता था सौ ग़म के समंदर 

दो अश्क भी अब मुझ से सम्हाले नहीं जाते 

******** 

मेरा दिल है और आपकी याद है, 

ये घर आज कितना आबाद है 

********** 

काश ऐसा तालमेल सकूत व सदा में हो 

 उसको पुकारूँ तो उसी को सुनाई दे 

***** 

शहर में तो रुखसती दहलीज़ तक महदूद है 

गाँव में पक्की सड़क तक लोग पहुंचाने गए 

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तेरे पास आ के हँसाऊँगा तुझे लेकिन 

जाते-जाते तेरे दामन को भिगो जाऊंगा 

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And one new one from the poetry group: 

मुँह ज़बानी न जताता कि मोहब्बत क्या है

मैं तुझे कर के दिखाता कि मोहब्बत क्या है


कैसे सीने से लगाऊँ कि किसी और के हो

मेरे होते तो बताता कि मोहब्बत क्या है


ख़ूब समझाता तुझे तेरी मिसालें दे कर

काश तू पूछने आता कि मोहब्बत क्या है

******* 

बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूंगा सोचा था

तिरी जुदाई ही वजह-ए-नशात हो गई है

- Tahzeeb Hafi 

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अपनी वजह-ए- बर्बादी सुनिए तो मज़े की है 

ज़िंदगी से यूं खेले जैसे दूसरे की है 

- जावेद अख्तर 

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ये किसकी तुम्हें नज़र लग गई है 

बहारों के मौसम में मुरझा रहे हो 

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वो ना आएं तो सताती है खलिश सी दिल को 

वो जो आयें तो खलिश और जवां होती है 

*** 

मुझ से मिलने के वो करता था बहाने कितने 

अब गुजारेगा मेरे साथ ज़माने कितने 


जिस तरह मैंने तुझे अपना बना रखा है 

सोचते होंगे यही बात ना जाने कितने 


तुम नया ज़ख्म लगाओ तुम्हें इस से क्या है 

भरने वाले हैं अभी ज़ख्म पुराने कितने 

*********** 

तुम आँखों की बरसात बचाए हुए रखना 

कुछ लोग अभी आग लगाना नहीं भूले 

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अच्छा सा कोई मौका, तन्हा सा कोई आलम 

हर वक़्त का रोना तो, बेकार का रोना है 

******* 

जो तेरे पास नहीं था ऐ दोस्त, 

तुझको दुनिया ने वो क्या देना था

*********** 

चंद रिश्तों के खिलौने हैं जो हम सब खेलते हैं 

वरना सब जानते हैं, कौन यहाँ किसका है? 

************ 

बेसहारों से सहारों की तवक्को मत कर 

बादलों से कभी साया नहीं मांगा जाता 


जरफ से अपने ज़्यादा नहीं मांगा जाता 

प्यास लगती हो तो दरिया नहीं मांगा जाता 


मुस्तकल क्यूँ नहीं बस जाते मेरी आँखों में 

इन मकानों का किराया नहीं मांगा जाता 

  

एक शब ऐसी भी आती है अँधेरों वाली 

जब चरागों से उजाला नहीं मांगा जाता 


ना जलायी गई न दफ़्न हुई 

एक मय्यत है ज़िंदगी मेरी 

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सुनिए साहब, दरिया हो तो दरिया जैसी बात करो 

तेज़ लहर से बाढ़ तो इक जोहड़ में भी आ जाती है 

******* 

साहब-ए-सदर ज़रूरी नहीं कि वो मुजरिम भी हों 

जिनके हक में फैसले नहीं जाते 

****** 

किस कदर तेरी याद को है मुझ से हमदर्दी,

पाती है मुझे तन्हा तो चली आती है

  

I have no idea who the poets are. If you do know, pls comment and I will add. 

Monday, September 23, 2024

 मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे

- इफ़तिखार आरिफ़   

Saturday, October 21, 2023

Balmohan Pandeya shers

 एक ये ज़ख़्म ही काफ़ी है मिरे जीने को 

चारागर ठीक न होने की दवा दे मुझ को 

**************

चारागर ख़त्म भी कर कार-ए-नफ़स अबके बरस

तू तो कह देता है बस अबके बरस अबके बरस

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- ~ बालमोहन पांडेय

Thursday, September 07, 2023

more urdu poetry

वो कदम टूट गए जो तेरी महफ़िल की तरफ 

सोते सोते भी मचल जाते थे चलने के लिए 

*********** 

मुझको थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़ 

मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते 

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ये एक अदा रुलाएगी हमें तमाम उम्र, 

जाते हुए न प्यार से यूं मुस्कुराइए 

********* 

poets unknown

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Obstacles are what you see when you take your eyes off the goal. 

******** 

The sky is the daily bread of the eyes. 


Monday, September 04, 2023

Itni mushkil duniya mein

गीता हूँ कुरान हूँ मैं 

मुझको पढ़ इंसान हूँ मैं 


ज़िंदा हूँ सच बोल के भी, 

देख के खुद हैरान हूँ मैं 


इतनी मुश्किल दुनिया में 

क्यूँ इतना आसान हूँ मैं? 


चेहरों के इक जंगल में 

खोई हुई पहचान हूँ मैं 


क्या मैं, क्या मेरा वजूद? 

मुफलिस का अरमान हूँ मैं 


मुझको खबर है दुनिया की 

बस खुद से अनजान हूँ मैं 


दफन हैं जिस में ख्वाब ही ख्वाब 

ऐसा कब्रिस्तान हूँ मैं 

- poet not known (to me) 


Har ek raah kahin aur jaa niklati thee

वो याद आए तो जी से दुआ निकलती थी 

हर एक ज़ख्म से ठंडी हवा निकलती थी 


तेरी तलाश में क्या क्या न मरहले आए 

हर एक राह कहीं और जा निकलती थी! 


मिला जो साया तो दीवार आ गिरी सर पर

जहां खुला था कोई दर बला निकलती थी 


 Poet unknown 

Monday, January 29, 2018

Kuchh aur akele sher..

तेरे वादों पर कहाँ तक मेरा दिल फरेब खाये
कोई ऐसा कर बहाना मेरी आस टूट जाए
Tere vaadon par kahaan tak mera dil fareb khaaye
koi aisa kar bahaana meri aas toot jaaye.
- फ़ना निज़ामी कानपुरी


मैंने इक चाँद को गंवाया था
मैं सितारे शुमार क्या करती!

Maine ik chaand ko ganvaya tha
Main sitaare shumaar kya karti!
- I don't know who wrote this. Heard it in the khawatein ka mushaira at Jashne Adab 2017


चला जाऊँगा खुद को तनहा छोड़ कर "अल्वी"
मैं अपने आप को रातों में उठ कर देख लेता हूँ.


Chala jaoonga khud ko tanha chhod kar "Alvi"
Main apne aap ko raaton mein uTh kar dekh leta hoon.
- Alvi Sahab


मैं कहाँ गिरा पड़ा हूँ ये सबकी है नज़र
किस बुलंदी से गिरा हूँ कोई देखता नहीं


Main Kahaan gira pada hoon ye sabki hai nazar
Kis bulandi se gira hoon koi dekhta nahi..


Everyone can see where I lie, fallen.
No one has time to see the height I fell from.



Friday, October 06, 2017

Sher on reaping the benefits of hard work

धूप कब तक मुझे जलायेगी,
कल मेरे पेड़ भी बड़े होंगे 


Dhoop Kab tak mujhe jalayegi
Kal mere peD bhi bade honge..
- I think its by Bashir Badr, but not sure..

Friday, September 22, 2017

हम से मिलने की दुआ करते
फैज़ इतने वो कब हमारे थे ?

Tuesday, September 08, 2015

Ghazal

Ghazal is not something I dabble in often.. but here's one that might make some sense..

for what its worth..

बड़े दिनों तक परियों पे ऐतबार रहा 
बहुत मसीहा का भी इंतज़ार रहा 

यास तो बाद में बनी राज़दाँ मेरी 
पहले उम्मीद का इंतज़ार रहा 

तुमने मुझसे क्यूँ वफ़ा ना की 
इतना भर उसने बार बार कहा

मुआफ़ करना, और भूल जाना, एक सी बात नहीं  
सीने का खंजर भुलाने में ही करार रहा 

Tuesday, August 25, 2015

Poetry/ शायरी

शायरी
जैसे मलीहाबाद  के आमों का रस..... 
तुप्का तुपका
ज़बां पर टपके

बूँद बूँद
मीठी हुई जाए है 
वीरानगी
 

Wednesday, February 25, 2015

chand Sitaron se kya poochho - Abid Ali ABid

चाँद सितारों से  क्या पूछो , कब दिन मेरे फिरते हैं 
 वो तो बेचारे खुद हैं भिखारी डेरे डेरे फिरते हैं 

जिन गलियों में हम ने सुख की सेज पे रातें काटी थी 
उन गलियों में व्याकुल होकर साँझ सवेरे फिरते हैं 

जिन के शाम बदन साये में मेरा मन सुस्ताया था 
अब तक आँखों के आगे, वो बादल घनेरे फिरते हैं 

 कोई हमें भी ये समझा दो, उन पर दिल क्यों रीझ गया 
तीखी चितवन बाँकी छब वाले बहुतेरे फिरते हैं 

इस नगरी में बाग़ और बान की यारो लीला न्यारी है 
पंछी अपने सर पे उठाकर अपने बसेरे फिरते हैं 

लोग तो  दामन सी लेते हैं , जैसे भी हो जी लेते हैं 
आबिद हम दीवाने हैं  जो बाल बिखेरे फिरते हैं. 

 

Benaam sa ye dard ... Nida Fazli

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया हैं वो गुजर क्यों नहीं जाता

सबकुछ हैं क्या ढूंढती रहती हैं निगाहें
क्या बात हैं मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में
जो दूर हैं वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नहीं जाता

वो नाम जो बरसों से, ना चेहरा ना बदन हैं
वो ख्वाब अगर हैं तो बिखर क्यों नहीं जाता

Sunday, February 08, 2015

ab why should i alone suffer.. u also suffer..

https://www.youtube.com/watch?v=FcY4NZRrNxQ

:)
तुम बैठे हो, लेकिन  जाते  देख रहा हूँ
मैं तन्हाई के दिन आते देख रहा हूँ

आने वाले लम्हे से दिन सहमा है
तुमको भी डरते घबराते देख रहा हूँ

कब यादों का ज़ख्म भरे, कब दाग मिटें मिटे
कितने दिन लगते हैं भुलाते, देख रहा हूँ

 उसकी आँखों में भी काजल फैला है
मैं भी मुड़ के , जाते जाते देख रहा हूँ

Monday, September 15, 2014

ghazal

इश्क़ करने का बहाना चाहिए 
दिल को कोई अफ़साना चाहिए 

तेरे मेरे बीच कुछ तो है ज़रूर 
ज़लज़लों को भी निशाना चाहिए 

देखिये तूफां बड़ा मायूस है 
आशियाँ हमको बनाना चाहिए 

इस कदर मेरी वफ़ा महदूद है 
तारीकी में भी पैमाना चाहिए 

 महदूद:determined.
तारीकी : darkness.

My first ghazal...