किसी भी रिश्ते को नज़दीक से न देखो तुम
पहाड़ दूर से अच्छा दिखाई देता है
- Khaleel Dhantejwi
This is a random personal blog - covering everything from poetry to politics. Views presented are strictly my own.
किसी भी रिश्ते को नज़दीक से न देखो तुम
पहाड़ दूर से अच्छा दिखाई देता है
- Khaleel Dhantejwi
वक़्त-ए-सफ़र क़रीब है बिस्तर समेट लूँ
बिखरा हुआ हयात का दफ़्तर समेट लूँ
फिर जाने हम मिलें न मिलें इक ज़रा रुको
मैं दिल के आइने में ये मंज़र समेट लूँ
ग़ैरों ने जो सुलूक किया उसका क्या गिला
फेंके हैं दोस्तों ने जो पत्थर समेट लूँ
कल जाने कैसे होंगे कहाँ होंगे घर के लोग
आँखों में एक बार भरा घर समेट लूँ
तार-ए-नज़र भी ग़म की तमाज़त से ख़ुश्क है
वो प्यास है मिले तो समुंदर समेट लूँ
'अजमल' भड़क रही है ज़माने में जितनी आग
जी चाहता है सीने के अंदर समेट लूँ
Ajmal Ajmali
मंज़िलें क्या बताएँ मैं क्या हूँ
ज़िंदगी का उदास रस्ता हूँ
काम आई न कुछ शनासाई
शहर की भीड़ में अकेला हूँ
ख़ार-ओ-ख़स ही सही मगर यारो
मैं भी सहन-ए-चमन का हिस्सा हूँ
आप अपनी सुनाइए 'मासूम'
मेरी क्या पूछते हैं अच्छा हूँ
~ मासूम शर्क़ी
****
There is a song in a Hindi film that is also a ghazal:
यूं हसरतों के दाग मुहब्बत में धो लिए
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो दिए
******
And a Ghalib sher that comes to mind:
कब से हूँ क्या बताऊँ जहां-ने-खराब में
शब और हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में
*****
जितना सुधार दिया है खुद को मैंने
उतना तो मैं खराब भी नहीं था
जिस बेरहमी से तोड़ा है ज़िंदगी तूने
उतना बड़ा तो मेरा ख्वाब भी नहीं था
- From the Insta of Saima123. Don't know the name of the poet.
मांगी - तांगी हुई सी कुछ बात
दिन की झोली में भीख की रातें
मेरी दहलीज़ पर भी लाई थी
ज़िंदगी दे गई है सौगातें
************
चाँद तन्हा है आसमान तन्हा
दिल मेरा है कहाँ कहाँ तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा
हमसफ़र कोई 'गर कोई मिले भी कहीं
दोनों चलते रहें यहाँ तन्हा
जलती बुझती सी रोशनी के पड़े
सिमटा सिमटा सा इक मकां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा
***********
टुकड़े टुकड़े दिन बीता, धज्जी धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली
रिमझिम रिमझिम बूंदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हंस दीं, दिल रोया, ये अच्छी बरसात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
होंठों तक आते- आते, जाने कितने रूप भरे
जलती बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली
**********
आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता
जब ज़ुल्फ़ की कालिख में गम जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता
बहते हुए आँसू ने कहा आँखों से थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता
(How much I LOVE this sher)
दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता
*******
बैठे हैं रास्ते में बयाबान-ए- दिल सजा कर
शायद इसी तरफ से इक दिन बहार गुज़रे
****
मेरी तरह सम्हाले कोई जो दर्द जानूँ
इक बार दिल से हो कर परवरदिगार गुज़रे
*******
कुछ ग़म मेरे दिल से सम्हाले नहीं जाते
आँसू भी उन्हें साथ बहा ले नहीं जाते
ग़म हो के खुशी आँखों में आ जाते हैं आँसू
दुख सुख में मेरे चाहने वाले नहीं जाते
ये वक़्त फक्त पाँव के छालों का हैं मरहम
पड़ जाते हैं जो दिल में वो छाले नहीं जाते
एक वक़्त था, पी जाता था सौ ग़म के समंदर
दो अश्क भी अब मुझ से सम्हाले नहीं जाते
********
मेरा दिल है और आपकी याद है,
ये घर आज कितना आबाद है
**********
काश ऐसा तालमेल सकूत व सदा में हो
उसको पुकारूँ तो उसी को सुनाई दे
*****
शहर में तो रुखसती दहलीज़ तक महदूद है
गाँव में पक्की सड़क तक लोग पहुंचाने गए
*******
तेरे पास आ के हँसाऊँगा तुझे लेकिन
जाते-जाते तेरे दामन को भिगो जाऊंगा
*******
And one new one from the poetry group:
मुँह ज़बानी न जताता कि मोहब्बत क्या है
मैं तुझे कर के दिखाता कि मोहब्बत क्या है
कैसे सीने से लगाऊँ कि किसी और के हो
मेरे होते तो बताता कि मोहब्बत क्या है
ख़ूब समझाता तुझे तेरी मिसालें दे कर
काश तू पूछने आता कि मोहब्बत क्या है
*******
बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूंगा सोचा था
तिरी जुदाई ही वजह-ए-नशात हो गई है
- Tahzeeb Hafi
**********
अपनी वजह-ए- बर्बादी सुनिए तो मज़े की है
ज़िंदगी से यूं खेले जैसे दूसरे की है
- जावेद अख्तर
*****
ये किसकी तुम्हें नज़र लग गई है
बहारों के मौसम में मुरझा रहे हो
*******
वो ना आएं तो सताती है खलिश सी दिल को
वो जो आयें तो खलिश और जवां होती है
***
मुझ से मिलने के वो करता था बहाने कितने
अब गुजारेगा मेरे साथ ज़माने कितने
जिस तरह मैंने तुझे अपना बना रखा है
सोचते होंगे यही बात ना जाने कितने
तुम नया ज़ख्म लगाओ तुम्हें इस से क्या है
भरने वाले हैं अभी ज़ख्म पुराने कितने
***********
तुम आँखों की बरसात बचाए हुए रखना
कुछ लोग अभी आग लगाना नहीं भूले
****
अच्छा सा कोई मौका, तन्हा सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो, बेकार का रोना है
*******
जो तेरे पास नहीं था ऐ दोस्त,
तुझको दुनिया ने वो क्या देना था
***********
चंद रिश्तों के खिलौने हैं जो हम सब खेलते हैं
वरना सब जानते हैं, कौन यहाँ किसका है?
************
बेसहारों से सहारों की तवक्को मत कर
बादलों से कभी साया नहीं मांगा जाता
जरफ से अपने ज़्यादा नहीं मांगा जाता
प्यास लगती हो तो दरिया नहीं मांगा जाता
मुस्तकल क्यूँ नहीं बस जाते मेरी आँखों में
इन मकानों का किराया नहीं मांगा जाता
एक शब ऐसी भी आती है अँधेरों वाली
जब चरागों से उजाला नहीं मांगा जाता
ना जलायी गई न दफ़्न हुई
एक मय्यत है ज़िंदगी मेरी
*******
सुनिए साहब, दरिया हो तो दरिया जैसी बात करो
तेज़ लहर से बाढ़ तो इक जोहड़ में भी आ जाती है
*******
साहब-ए-सदर ज़रूरी नहीं कि वो मुजरिम भी हों
जिनके हक में फैसले नहीं जाते
******
किस कदर तेरी याद को है मुझ से हमदर्दी,
पाती है मुझे तन्हा तो चली आती है
I have no idea who the poets are. If you do know, pls comment and I will add.
मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे
- इफ़तिखार आरिफ़
एक ये ज़ख़्म ही काफ़ी है मिरे जीने को
चारागर ठीक न होने की दवा दे मुझ को
**************
चारागर ख़त्म भी कर कार-ए-नफ़स अबके बरस
तू तो कह देता है बस अबके बरस अबके बरस
*********
- ~ बालमोहन पांडेय
वो कदम टूट गए जो तेरी महफ़िल की तरफ
सोते सोते भी मचल जाते थे चलने के लिए
***********
मुझको थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
**************
ये एक अदा रुलाएगी हमें तमाम उम्र,
जाते हुए न प्यार से यूं मुस्कुराइए
*********
poets unknown
******
Obstacles are what you see when you take your eyes off the goal.
********
The sky is the daily bread of the eyes.
गीता हूँ कुरान हूँ मैं
मुझको पढ़ इंसान हूँ मैं
ज़िंदा हूँ सच बोल के भी,
देख के खुद हैरान हूँ मैं
इतनी मुश्किल दुनिया में
क्यूँ इतना आसान हूँ मैं?
चेहरों के इक जंगल में
खोई हुई पहचान हूँ मैं
क्या मैं, क्या मेरा वजूद?
मुफलिस का अरमान हूँ मैं
मुझको खबर है दुनिया की
बस खुद से अनजान हूँ मैं
दफन हैं जिस में ख्वाब ही ख्वाब
ऐसा कब्रिस्तान हूँ मैं
- poet not known (to me)
वो याद आए तो जी से दुआ निकलती थी
हर एक ज़ख्म से ठंडी हवा निकलती थी
तेरी तलाश में क्या क्या न मरहले आए
हर एक राह कहीं और जा निकलती थी!
मिला जो साया तो दीवार आ गिरी सर पर
जहां खुला था कोई दर बला निकलती थी
Poet unknown