Showing posts with label Story. Show all posts
Showing posts with label Story. Show all posts

Thursday, December 22, 2022

Short Story: Vo Shaam Kuchh Ajeeb Thi / वो शाम कुछ अजीब थी

 “कविता और जीवन साथ-साथ  नहीं चलते। कभी कभी कविता मनुष्य की हर कल्पना से बहुत आगे निकल जाती है। और कभी गहरी से गहरी कविता भी यथार्थ की जटिलता के सामने उथली लगती है। कविता और जीवन साथ नहीं चलते।“

ऐसी ही बेतुकी और बेबुनियाद बकवास लिखने मैं अक्सर घर से निकलता था, और पड़ोस की ईरानी चाय की दुकान पर डेरा जमा लेता था। मुझ पर शायर बनने का फितूर था। किसी की कल्पना में आज तक अपनी प्रतिभा को ले कर कोई शक उत्पन्न नहीं हुआ है। मेरे मन में भी कोई शंका नहीं थी। चचा ग़ालिब मुझसे मिले नहीं थे, अन्यथा अपना साहित्यिक उत्तराधिकारी मुझे ही नियुक्त कर के जाते, इस में कोई संशय नहीं।

हर कामयाब शायर के पीछे होता है एक चीखता, चिल्लाता, गालियां देता खानदान। मेरे पीछे भी था। आप बड़े शहर में रहने वाले नहीं समझ सकते कि छोटे शहरों में शायर बनने की महत्वाकांक्षा कैसी फजीहत कराती है। मैं कहना चाहता हूँ कि केवल ईरानी चाय वाले अंकल को मुझ से हमदर्दी थी – पर ऐसा भी कुछ नहीं था। समय देख कर वे भी मुझे कोई काम ढूंढने की सलाह दे ही देते थे।

इश्क का अरमान हर लड़के को होता है। मुझे भी था। पर उस दिशा में (या किसी भी दिशा में) मेहनत करने वाले दिन हम पैदा नहीं हुए थे। यहाँ तक की शायरी के लिए भी इसलाह लेना हमें मंजूर न था। “मेरी आवाज़ मेरी अपनी है – इस पर दुनिया के नियमों की दराँती नहीं चलनी चाहिए” जैसे जुमलों के पीछे हम अपनी प्रतिभाहीनता और आलस्य, दोनों को छिपाते थे।

कॉलेज के कुछ और दोस्त थे जिनकी कहीं नौकरी वौकरी नहीं लगी थी। मेरी बेवकूफी के मज़े लेने वो हफ्ते में 2-3 बार आ बैठते थे। उस दिन भी ऐसा ही कुछ था। सुरेश, राजेश, महेश टाइप के दोस्त आ कर बैठे थे। महेश उदास लग रहा था। पहले मैंने उसका दिल बहलाने के लिए 2-3 चुटकुले सुनाए। पर कोई असर न होता देख हमें लगा कि मामला गड़बड़ है। हमने उस से कुरेद कर पूछा। उदास व्यक्ति यूं ही गुब्बारे जैसा होता है – छोटा सा पिन चुभाते ही फट कर सारे राज़ खोल देता है। महेश की बहन की शादी थी। वर पक्ष की ओर से एक कन्या उसे पसंद आ गई थी, पर नौकरी ना होने से आगे कोई बात चल नहीं सकती थी। साथ ही रिश्तेदारी का मामला था – आशनाई की नहीं जा सकती थी, पर महेश बाबू का हृदय किसी प्रकार न मानता था।

बात सच में गंभीर थी। महेश ने हमें अपने फोन पर उसकी फोटो दिखाई, जो रोके में ली गई थी। हम सब ने रिवाज निभाते हुए कहा कि सच में बहुत सुंदर है। पर उस से आगे बात न बनी। महेश अपना मन हल्का करने के लिए एक कप  चाय और मँगवा कर पीने लगा। दारू का विचार, जो इस समय आपको आ रहा है, हम सब को भी आया। पर छोटे शहर में बेकार होने पर दारू पीना यानि अपनी शामत बुलवाना। पहले तो दुकान से आते जाते अंकल आंटी वहीं डांट देंगे, फिर घर पर जो मार पड़ेगी सो अलग।

अगले दिन महेश फिर आया। वैसे ही उदास। इस बार अकेला। हमने युक्ति लगाई। कन्या को पाने के 2 तरीके हैं – या नौकरी पा ली जाए, या पीठ पीछे लड़की को फँसाया जाए। हमने दोनों करने की सोची। महेश जी अगले दिन से अपने पिता की किराने की दुकान पर बैठने लगे, और मैंने लड़की का पीछा कर के उसकी पसंद नापसंद जानने का प्रोजेक्ट शुरू किया, ताकि आशिक साहब की मदद हो जाए।

एक हफ्ते में महेश को यह पता चल गया कि पिता के साथ दुकान पर बैठना उसके बस का नहीं। भूखों मरता हो तब भी नहीं। और मुझे पता चला कि गौरी को गोलगप्पे पसंद हैं, एक कपड़े की दुकान पर वह अमूमन 2-3 बार हफ्ते में जाती है, और उसका ट्यूइशन उसके घर से २० मिनट की दूरी पर है। ट्यूइशन से एक लड़का रोज उसका पीछा करता है घर से 5 मिनट दूर तक।

सबसे पहले तो ट्यूइशन वाले प्रेमी महोदय को सूचित किया गया कि गौरी उनके बस की नहीं। फिर महेश ने उस कपड़े की दुकान पर मैनेजर की नौकरी पकड़ ली। उसे ये नौकरी दिलाने के लिए हमें जो पापड़ बेलने पड़े वो फिर किसी दिन बताएंगे। और उसे उस नौकरी में रखने के लिए हम 2 दोस्त उसी दुकान पर मुफ़्त में नौकर हो गए। दुकान वाले अंकल खुश कि मैनेजर 2 बेगार के नौकर लाया है, मुझे क्या!

आपको एक बात अभी बता दूँ – कपड़ों की दुकान की नौकरी ईंट के भट्टे की नौकरी से बहुत बुरी है। जितना आप एक पूरे दिन में सोचते हैं, उस से ज़्यादा हर एक ग्राहक बोलता है। जितने कपड़े आप एक साल में पहनते हैं, उस से ज़्यादा हर ग्राहक खुलवा कर छोड़ देता है।

बस एक फायदा हुआ कि ईरानी चाय के पैसे बच गए। मम्मी पापा भी खुश हुए हम तीनों के - कि चलो काम पर तो लगे।

इस सब में २ महीने गुज़र गए। गौरी और महेश की अब आँखों आँखों में बातचीत होती थी। महेश जी अब नौकरीशुदा भी थे, तो उनके आत्मविश्वास की भी सीमा नहीं थी।

एक दिन, बहुत हिम्मत कर के, महेश जी ने गौरी जी को चाय पर बुला ही लिया – ईरानी चाय की दुकान पर नहीं, अंग्रेजी कैफै कॉफी डे पर।

गौरी जी आईं। महेश जी ने बात शुरू की – “आपने शायद पहचाना नहीं होगा – आप अपने मौसेरे भैया के रोके में आई थीं, हम आपकी होने वाली भाभी के सगे भाई हैं।“

गौरी जी ने धीरे से मुस्कुरा कर बताया कि वे पहले दिन से उन्हें पहचान गई थीं।

इसके बाद पूरी पिक्चर की १६ रील चली – शर्माना, रूठना, मनाना, प्रेमाग्रह करना, न-नकुर कर के फिर मान जाना, और अब बात क्लाइमैक्स पर आ कर टिकी – कि गौरी जी के पिताजी रूपी शेर के गले में रिश्ता ले कर जाने वाला सर कौन देगा?

 

वो शाम, जिसके बारे में सुनने को आप उतावले हो रहे हैं, उसके बारे में बताने से पहले गौरी के शेर रूपी पिता और महेश के गाय स्वरूप पिता की बात बताना आवश्यक है।

गौरी के पिता थे ठेकेदार – अत: पुलिसवालों, व्यापारियों, ईंट-भट्टा वालों, इधर उधर के सरकारी सिविल इंजीनियर और बाकी बाबूलोग, इन सब से उनका मिलना जुलना लगा रहता था। बहुत धाक थी – रिश्तेदारी में भी और मुहल्ले में भी।

महेश के पिता UDC थे – Upper Division Clerk। मतलब हैसियत और शख्सियत – दोनों से मध्यम वर्गीय। 

 

उस दिन, गौरी-महेश उसी कैफै कॉफी डे में बैठे कॉफी पी रहे थे, जब किसी कारणवश महेश के पिताजी का वहाँ आना हुआ। आ कर वे एक महिला के ठीक सामने बैठे। कुछ देर इधर उधर देखा। महेश की उनकी ओर पीठ थी। इसलिए बाप बेटा एक दूसरे को नहीं देख पाए। जब अंकल ने देखा कि सब ठीक ठाक है, तो धीरे से मुस्कुराये। आंटी का हाथ, जो टेबल पर उनके हाथ की बाट जोह रहा था, उन्होंने धीरे से थाम लिया। फिर वे दोनों धीरे धीरे बातें करने लगे।

महेश ने यह सब नहीं देखा था। पर गौरी देख रही थी।

उसने महेश से उसी समय वादा लिया कि आज के आज वह अपने घर में बात करेगा और कल – परसों में अपने माता पिता को रिश्ता ले कर भेज देगा नहीं तो वह किसी और रिश्ते के लिए हाँ कर देगी।

महेश इस अचानक वार से हतप्रभ था। पर इसकी अवश्यंभाविता को वह समझ गया था।

उसी समय घर पहुंचा। पिताजी अभी घर नहीं आए थे। महेश ने माँ को अकेला पा कर धीरे से उन से बात की। माँ ने घर खानदान का पूछा। महेश को कुछ पता न था। बस इतना भर कि जीजाजी की मौसेरी बहन है।

माँ अब परेशान। बेटी के भावी ससुराल में फोन कर के खानदान की जांच परख कैसे करें। बेटा तो दो दिन रुकने को तैयार नहीं है। पति हैं कि पता नहीं कहाँ गायब हैं।

पिताजी रात को आठ बजे घर पहुंचे। माताजी ने किसी तरह उन्हें चाय दी और उसी समय रामायण खोल कर बैठ गईं। पिताजी गौरी जी के पिता को जानते थे। उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी।

उसी समय महेश की दीदी ने अपने “उन” को फोन लगाया और बात बताई। साथ ही गौरी जी का अल्टीमेटम भी सुना दिया – कि १-२ दिन में रिश्ता ले कर जाना है।

अब जीजाजी फंसे।

घर पर माता पिता से कहते हैं, तो रिश्ता स्वीकार होने की कोई गुंजाइश नहीं। उल्टा ऐसे लुच्चे लड़के की बहन को उनके घर में लाया जाए या नहीं, इस पर भी विचार शुरू हो जाएगा।

उन्होंने दबे शब्दों में दीदी से कहा कि बात उनकी शादी तक टल जाए, तो अच्छा रहेगा।

महेश ने ये बात गौरी जी से कही, पर गौरी जी ने अपनी deadline नहीं बदली। १-२ दिन मतलब १-२ दिन। (उसे डर था कि महेश के पिता के प्रेम प्रसंग की बात अगर निकल गई, तो रिश्ता होगा ही नहीं)

अब क्या किया जाए? घर के चारों सदस्य बैठे। दीदी ने अपनी परेशानी बताई और महेश ने अपनी।

पिताजी ने ज़ोर का ठहाका लगाया। किसी को इसकी आशा नहीं थी। पिताजी शांत, सोबर किस्म के आदमी थे। आसानी से डरने वाले।

फिर वे बोले, “ फिकर न करो। अभी सब ठीक कर के आता हूँ।“ ऐसा कह कर वे रात के ९ बजे घर से निकले। अब छोटे शहरों में रात के ९ बजे लोग घर में होते हैं और बाजार आदि में... आप समझ गए कौन होते हैं।

पिताजी ९ बजे निकले तो १०:३० बजे लौटे। मोबाईल भी नहीं उठा रहे थे। माँ तो डर के मारे बेहाल!

पिताजी ने आते ही घोषणा की – घंटा भर रुको, बताता हूँ।

घंटा बीता। कोई नहीं सोया। उसके ऊपर भी ५ मिनट हो गए। पिताजी बस अपना फोन देखते जा रहे थे। कह कुछ नहीं रहे थे। माँ ने सोने की तैयारी शुरू की। जब चादरें बिछ चुकीं, तब पिताजी अपने कमरे से निकले – “परसों नेग ले कर जाना है, बस शगुन कर के लड़की रोक लेंगे। अगले हफ्ते सगाई कर देंगे। जैसा तुम्हारी बहु चाहती है, वैसा ही होगा। ब्याह भी जल्दी ही कर लेना। अब रुकने से क्या फायदा! तुम दोनों राज़ी हो, तुम्हारी नौकरी लगी है, लड़की भी final year में है।“

हम जैसे निठ्ठले दोस्त और हर समय कोसे जाते हैं, पर शादी के समय सबसे ज़्यादा काम बेरोजगार दोस्त ही करते हैं, इस बात का इतिहास गवाह है।

सगाई हुई, शादी भी हो गई।

पर मैं भी तो कवि हूँ। इस कहानी का सब से गूढ रहस्य सब से छुपा रहा था – मुझ से नहीं – आखिर गौरी जी के पिताजी ने हाँ कर कैसे दी, वह भी एक ही शाम में? एक ही शाम में दोनों माता पिता को प्रेम विवाह के प्रकरण में मना लेना चमत्कार था, Guinness का रिकार्ड था! और वह राज़ था, जिसका खुलना ज़रूरी था।

गुत्थी की चाबी थी महेश के पिता के पास। तो, हम लोगों ने दूल्हे को honeymoon पर विदा वगैरह करा कर, एक दिन अंकल को धर लिया। सोम रस का पान कराया गया, धर्मभीरु आत्मा में से धर्म का भय निकाला गया, और फिर, जब लोहा गरम हुआ, तब चोट की गई – उन से गौरी जी के पिता के मानने का रहस्य पूछा गया।

“वो क्या बताऊँ बेटा.. तुम लोग भी अब जवान हो, सब समझते हो। वो, ठेकेदार साहब की जो ‘वो’ हैं न, उनके बारे में मैं तो जानता हूँ, भाभी जी नहीं जानती हैं। उन्हें लगता है कि मेरा पति घूस देता है, सिमेन्ट में रेत मिलाता है, पर पराई स्त्री को कभी बुरी नज़र से नहीं देखता।

अब बात ये है कि ठेकेदारी के कारोबार में जितना पैसा लगा है, वह भाभीजी के मायके का है।  

तो मैंने उन से कहा, समधी बन जाते हैं, घर की बात घर में ही रहे, तो अच्छा है।

समझदार तो वे हैं ही, फौरन मान गए।“

मैंने कहा था न, कभी गहरी से गहरी कविता भी यथार्थ की जटिलता के सामने उथली लगती है।

 

Monday, September 19, 2022

देवी आहिल्या का मुकदमा

Note: 

1. This story is based on the original story of Devi Ahilya being cursed by her husband, Rishi Gautam, for her disloyalty. Please read that story for context. 

2. I understand that in some versions of the original story, Devi Ahilya knew that Indra wasn't her husband and was complicit in the act. However, in the original version that I have read, Devi Ahilya was tricked into believing that it was her husband. I accept this version of the story, simply because if Devi Ahilya was complicit, Indra would not have needed to take another form at all. Also, that was the first version I heard from my family. The second version, of Devi Ahilya being complicit, appears to be of recent origin. 



स्वर्ग में हाहाकार मचा हुआ थाऋषि गौतम ने देवी अहिल्या को श्राप दिया था! किन्तु यह क्या! देवी अहिल्या ने ऋषि गौतम का श्राप लौटा दिया, और अपने पति से मुकदमे की मांग करने लगीं।

“आपने मुझे पवित्र होते हुआ भी श्राप दिया है! इस श्राप को अपनाने का अर्थ है, अपना दोष मान लेना। किन्तु मैं दोषी नहीं हूँ! इसलिए मुझे न्याय चाहिए!”

ऋषि गौतम और देवी आहिल्या के बीच का झगड़ा,वह भी देवराज इंद्र के कारण! त्रिमूर्ति के अलावा उस का निर्णायक कौन हो सकता था? यही निश्चय किया गया कि उस मुकदमे के जज त्रिमूर्ति में से ही एक होंगे।

पहला नाम तो ब्रह्मा जी का ही आया। किन्तु ऋषि गौतम को देवी सरस्वती का स्मरण हो आया और उन्होंने ब्रह्मा जी को जज बनाने का विचार तुरंत छोड़ दिया।

अगला नाम श्री विष्णु का था। जैसे ही वे सब अपना मुकदमा ले कर बैकुंठ पहुंचे, श्री लक्ष्मी देवी ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया। “मेरे पति वैसे ही दुनिया भर के जी जंजालों में फंसे हुए हैं! ब्रह्मा जी बना कर निकल लिए और शिव जी को हर युग में एक बार काम करना होता है। पर ये रोज़  का पालन पोषण, इस में कितना समय लगता है, कितनी मेहनत करनी पड़ती है, किसी ने सोचा है!? 2 पल का समय नहीं मिलता हम पति पत्नी को साथ में बैठने का! शिव और पार्वती जी तो धरती भ्रमण को भी साथ ही जाते हैं, पर इनके और मेरे तो भक्त भी same नहीं हैं! इनको अलग प्रार्थना की कॉल पर जाना पड़ता है और मुझे अलग! तरस गई मैं साथ में बैठ कर एक समय का भोजन करने को! खबरदार जो उन्हें एक पल का भी काम और देने की सोची! वैसे भी, धरती के संविधान में अब Executive और Judiciary का काम एक ही संस्था को नहीं दे सकते। वैकुंठ का ऑफिस केवल Executive है, हमें Judiciary चलाने का अधिकार नहीं है। आप लोग अपना झगड़ा ले कर कहीं और जाइए!”

 

अब तीसरा नाम शिव का ही हो सकता था। यह प्रस्ताव देवी आहिल्या को विशेषकर अच्छा लगा। उन्होंने कहा, “शिव तो हैं ही एक पत्नी धारी। उन्होंने माँ पार्वती के देह छोड़ने के बाद भी, उनके अगले जन्म की प्रतीक्षा की। और कोई विवाह नहीं किया। ऐसी ही निष्ठा मेरी भी मेरे पति के प्रति है। शिव ही श्रेष्ठ रहेंगे। निष्ठा और loyalty की पहचान शिव से अच्छी कौन कर सकता है?”

बात सभी को जंच गई।

शिव की अदालत में मुकदमा शुरू हुआ।

गौतम ने पहले अपनी बात रखी – मेरी पत्नी सती है। इसे अपनी योगिक शक्ति से पता चल जाना चाहिए था कि वह पुरुष मैं नहीं, मेरे रूप में इन्द्र है! यदि उसे पता नहीं चला, तो अवश्य ही उसके सतीत्व में कोई खोट है।“

सभा में सब सर हाँ की मुद्रा में हिले। देवी आहिल्या कोई ऐसी वैसी पत्नी नहीं थीं। कितनी विद्या और योग शक्ति थी उनके पास!

अब देवी अहिल्या उठीं।

“मेरे पति का आरोप है, कि मैंने अपनी दिव्य दृष्टि से क्यूँ नहीं देखा कि वे गौतम नहीं, इन्द्र हैं?

मेरा कहना है की यह प्रश्न ही निर्मूल है। मेरे जानने या न जानने से घटनाक्रम पर कोई असर ही नहीं पड़ता । कैसे?

अगर मैं जान भी लेती कि यह व्यक्ति इन्द्र है, तब भी, क्या वह मान जाता कि वह इन्द्र है? वह हठ करता कि वह गौतम ही है। इस हठ के सामने मेरी एक नहीं चलती। आज भी, धरती लोक पर एक ब्याहता पत्नी अपने पति के परिणय निवेदन को अस्वीकार नहीं कर सकती। Marital rape is not a crime on Earth.अगर मैं मना भी करती, और वह बल का प्रयोग करता, क्यूंकि ऐसा हर पति का अधिकार है। “

पार्वती जी और गणिकाएँ यह सुन कर हाँ की मुद्रा में सर हिलाने लगीं।

“पर तुम फिर भी check तो कर सकती थीं?” गौतम अब भी हार मानने को तय्यार नहीं थे।

“पतिदेव, आप, मुझ, और इन्द्र में से, सर्वाधिक मायावी शक्तियां इन्द्र के पास हैं, उस के बाद आप के पास। आप मुझे बताइए – आधी रात को मुर्गा बांग देता है, चाँद अब भी आसमान में है, और आपको कुछ खटकता भी नहीं? मुझ सोई हुई को चेक कर लेना चाहिए था? आपकी दिव्य दृष्टि कहाँ थी?

धरती पर भी एक कहावत है – ज़र, जोरू, और ज़मीन का ध्यान रखना चाहिए। तो आप बताइए, कि आपने अपनी पत्नी की रक्षा क्यूँ नहीं की? आपके सामने लक्षण थे, उन  लक्षणों को आपने अनदेखा किया।  आपकी लापरवाही से मेरे मान की हानी हुई। आपको क्या दंड मिलना चाहिए?”

सभा में चुप्पी छा गई। केवल देवी अहिल्या की आवाज आ रही थी।

“मैं किसी पर पुरुष से संसर्ग करने घर के बाहर नहीं गई। ना ही मैंने आपको छल से कहीं भेज कर पर पुरुष को आमंत्रित किया। आपकी लापरवाही से, आपके घर में, आपके संरक्षण में, मेरे साथ छल हुआ है।

मैंने अपने पति का परिणय निवेदन पाया, और हमेशा की तरह हाँ कर दी।

इन में से आप क्या बदलना चाहेंगे?

क्या हर सती स्त्री अपने पति का परिणय निवेदन पाते ही दिव्य दृष्टि से चेक करे, कि यह व्यक्ति पति है कि नहीं?

या, सती स्त्री को अधिकार है, कि यदि वह शंका में हो तो पति से संसर्ग न करे?”

जैसे ही देवी आहिल्या की बात समाप्त हुई, शिव और पार्वती ने धीरे से एक दूसरे को  देखा और मुस्कुराये।

ऋषि गौतम को परिणाम सुनने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। पर मुद्दई थे, मुकदमा छोड़ कर भी कैसे भागते?

शिव जी ने देवी अहिल्या से पूछा – “देवी, आपके पति से, अपने घर में, आपके संरक्षण में कमी हुई है। रात्रि के समय वे आपको अकेला छोड़ कर चले गए थे। इसका दंड तो उन्हें दिया जा सकता है, पर पति पत्नी का मामला है, आप लोग आपस में सुलझा भी सकते हो।“

ऋषि गौतम और देवी अहिल्या ने एक दूसरे की ओर देखा, और जैसे Family Court से सफल जोड़े निकलते हैं, दोनों हाथ में हाथ डाले वहाँ से निकले।

Thursday, June 09, 2022

Short Story - Dear God, Are you there?

 

“हाँ जी? आ गए? मैं हूँ!”

रोज़ की भांति सुधि ने दिया जलाया, और फिर टेक ले कर बैठ गई, और पूरे दिन का हिसाब किताब बताने लगी। कौन मिलने आया था, किसको ठीक किया, किसको लौटा दिया, क्या अच्छा लगा, क्या नहीं.. मन भर के बातें करने के बाद वह ज़ोर से खिलखिला कर हंसी। फिर ध्यान लगा कर सुनने लगी। सुनने की मुद्रा में कभी सर हिला देती, कभी ‘अच्छा, ठीक है’ जैसे स्वरों से स्वीकृति जताती। एकाएक उठ कर कागज कलम ले आई और लिखने लगी। लिख कर कागज दीपक की ओर बढ़ाती हुई बोली, “ये देखो, नाम और जगह दोनों ठीक हैं न?”

थोड़ी देर में एक सेवादार ने द्वार धीरे से खोल कर पूछा, “दीदी, आपको सोने से पहले और कुछ चाहिए?”

“हाँ। सुनिए, ये कागज कल गेट पर दे देना तो। इन्हें मेरी आवश्यकता है। कल इन्हें सीधा मेरे पास ले आना। कतार में मत रखना।“

“जी। ” कह कर सेवादार द्वार से बाहर हो गई, और सुधि फिर से कमरे में अपने साथ।

हर बार की तरह कागज़ पहले महाराज के पास ले जाया गया, जहां उन्होंने नाम और गाँव का नाम अच्छे से लिखा, ताकि कोई गड़बड़ न हो, और फिर गेट पर भेज दिया।

सुधि, यूं तो उम्र में बड़ी नहीं थीं, पर थी वे इस इलाके में दीदी। उनका आश्रम बहुत जल्दी बहुत प्रसिद्ध हो गया था। लोग दूर दूर से आते थे, और झोली भर कर जाते थे। सुधि दीदी और महाराज ‘कृष्ण कथा वाचक’ थे। ये लोग सन्यासी होते हैं, जो कृष्ण कथा गाँव जा जा कर सुनाते हैं। जिस गाँव में कथा सुनाते हैं, वहीं के मंदिर में रह लेते हैं। ऐसे ही एक दिन ये दोनों कथा वाचक इस गाँव पहुंचे थे, पर किस्मत से उस दिन गाँव के पंच की हालत ठीक नहीं थी। सुधि भी पंडित जी के साथ चल पड़ी, और वहाँ पहुँच कर जाने कैसे चमत्कार से, पंच जी को ठीक कर दिया। बस, फिर गाँव के लोग उन्हें कहाँ जाने देते? मंदिर के पुजारी जी का कमरा खाली कर कर सुधि दीदी को दिया गया, और अगला कमरा महाराज जी को। महाराज जी छू कर ठीक नहीं करते थे। वे बस कथा करते थे, और दीदी का ध्यान रखते थे। उनका खाना पीना, सोना, कितने लोगों से मिलना है, कब थक कर बैठना है.. महाराज जी ने मानो सुधि को अचानक सह-कथा-वाचक से बेटी बना लिया था। जैसे जैसे सुधि की ख्याति बढ़ती गई, महाराज जी और भी गौण बनते गए, परंतु सुधि का ध्यान और भी तन्मयता से रखने लगे।

जिस मंदिर में उन्होंने एक रात आश्रय लिया था, वही अब उनका आश्रम बन गया था। दूर दूर से लोग आते थे। सुधि दीदी कुछ को शिफ़ा देतीं, कुछ को दिलासा, और कुछ को अपना संयम। वे कैसे छू कर बीमारी दूर कर देती थीं, किसी को पता नहीं था, महाराज जी को भी नहीं। पर यहाँ, जहां दूर दूर तक डिस्पेंसरी भी नहीं,  वहाँ सुधि दीदी को भगवान ने सचमुच अपना स्वरूप बनाकर ही भेजा था।

विंध्य प्रदेश के बारे में बाहर के लोगों को ज्यादा कुछ पता नहीं है। हरे जंगल, नदियां, यूं ही फुट पड़ते झरने, और बहुत सारी गरीबी। यहाँ खेती के आयाम बहुत सीमित हैं, और उससे होने वाली आमदनी उसे से भी अधिक सीमित। कुछ असीमित है तो गरीबी। गरीबी यहाँ का नॉर्मल है।

**********

अगले दिन, रोज की ही तरह कतार लंबी थी। गेट पर एक सज्जन ने अपना नाम और गाँव का नाम दिया, तो गेट वालों ने उन्हें बड़े आदर के साथ कतार से बाहर कर पानी पिलाया। नए आने वालों ने नाक भौं सिकोड़ी, पुराने आने वाले बस हौले से मुस्काए। दीदी को कभी कभी सँदेसा मिलता था, उन लोगों को सीधे दीदी के पास ले जाया जाता था। इस में भेद भाव की कोई बात नहीं। ये नाम तो सीधे भगवान से आते थे मानो।

जिन सज्जन को निकाला गया था, उनका नाम था ज्ञानचंद (गियानू)। वे पहली बार आए थे। बड़े भौचक्क! उन्होंने किसी से कोई सिफारिश नहीं की थी, किसी को बताया भी नहीं था वे यहाँ आ रहे हैं। कल उनके गाँव के मुखिया जी ने कहा था, “बिटिया की टांग ठीक नहीं होती तो एक बार सुधि दीदी के आश्रम में दिखाए आओ, क्या पता कुछ कर ही दें!”

गियानू जी ने बिना किसी को बताए, बस ऐसे ही सफर शुरू कर दिया था। फिर ये कतार से निकाल कर विशेष आवभगत क्यूँ?

गार्ड ने बताया – दीदी कभी कभी किसी आने वाले का दुख पहले से जान लेती हैं, उनके लिए सँदेसा सीधे भगवान से आता है।

सेवादार उन्हें सुधि दीदी के पास ले गए।

मुख पर दिव्य प्रकाश! आँखों में तेज और करुणा का सा मिश्रण।

गियानू जी स्वत: ही नतमस्तक हो गए।

“बिटिया की टांग ठीक हो जाएगी। कोई चिंता नहीं। आप ही के कर्मों के कारण कष्ट है, आप ही के कर्मों से ठीक भी हो जाएगा।“ सुधि दीदी ने मृदु, पर सटीक स्वर में कहा। गियानू जी ने ये सोचने की चेष्टा भी नहीं की कि इन्हें बिटिया की पीड़ा बिन बताए कैसे मालूम। दैवी जनों को पता चल ही जाता है।

“मेरे कर्मों से कैसे दीदी?”

“अधिया में कितनी जमीन दिए हो, और तिहैया में कितनी?”

“अधिया में 2 एकड़, और तिहैया में 10 एकड़ दीदी” 

“उन जमीन मजदूरों को कुछ खाने को नहीं मिला न पिछले साल? फसल हो गई बर्बाद?”

“सबकी ही हुई दीदी, अकेले मेरे ठेकेदारों की थोड़ी?”

“तो गियानू जी, जब उनके घर नहीं चल रहे, तो आपकी बिटिया कैसे चलेगी?”

गियानू सकपका गया।

“अधिया और तिहैया तो हमारी पुश्तैनी ठेकेदारी का तरीका है दीदी। सभी ऐसा ही करते हैं। तो फिर इस में गलत क्या है? और है भी तो अकेली मेरी बेटी क्यूँ तकलीफ में है?”

“गियानू, बताओ तो, हम व्रत कथा क्यूँ पढ़ते हैं?”

ये ज्ञान गियानू के बस का न था। “व्रत कथा क्यूँ पढ़ते हैं का क्या मतलब दीदी? व्रत अनुष्ठान के लिए! बिना कथा के व्रत कैसे पूरा होगा?”

“क्यूँ? पूजा में, व्रत कथा का क्या महत्व है?”

गियानू को ये सवाल समझ नहीं आया। जब सवाल ही समझ न आए, तो इंसान जवाब क्या सोचे। चुप चाप बैठ गया।

सुधि दीदी मुस्काई। “व्रत कथा इस लिए पढ़ी जाती है, कि जो एक के साथ हुआ, उस से सब सीख लें। एक बात सोचो तो। धूप में खटता हो किसान, बारिश, कीट से लड़ता हो किसान, और अपनी जमीन देने का, कोई आधी फसल ले ले, या दो तिहाई फसल ले ले, ये न्याय है क्या?”

“तो दीदी, क्या करें? जमीन मुफ़्त में दे दें?”

“यही तो आपको सोचना है गियानू। पुराने जमाने में, राजा अपनी जमीन किसानों को देता था, तब भी दसई या छठ से ऊपर कर नहीं लेता था। आप सोचिए, अधिया और तिहैया, इनका प्रभु के दरबार में क्या जवाब देंगे आप?”

गियानू जी चुप कर गए। क्या सचमुच उनकी बिटिया का दुख अधिया और तिहैया के कारण है?

“तो दीदी, जो मैं अधिया और तिहैया छोड़ दूँ, तो मेरी बेटी ठीक से चल पाएगी?”

“गियानू, तुम्हारी बिटिया ही नहीं, गाँव के और भी छोटे छोटे दुख दर्द कट जाएंगे। तौल के पलड़े बराबर रहें, तब ही व्यवहार होता है। पलड़े कोई अपने ज़ोर से ऊपर नीचे कर तो लेता है, पर भूल जाता है कि एक तुला उस के ऊपर भी तो है! ये उस तुला का वज़न पड़ा है तुम पर। घर जाओ, अधिया, तिहैया के बदले दसई , छठ, के बारे में सोचो। मेरे पास दोबारा आने की जरूरत नहीं। जब तुला के पलड़े बराबर हो जाएंगे, तब तुम्हारी बेटी यूं ही चलने लगेगी। ये बाट उठाना, संतुलन समझना, ये आप कर्ता लोगों को समझ आने वाली बातें है। हम प्रभु नाम में रमने वाले लोग है, तौल, बाट, पलड़े को कभी हाथ ही नहीं लगाया। पर जब कन्या ठीक हो जाए, तो अन्नपूर्णा माता का व्रत करना, और व्रत कथा में अपनी बिटिया की कथा कहना। जिसे भी, इस पूरे इलाके में, जब भी घर में कोई भी समस्या हो, वह अन्नपूर्णा माता का व्रत करे और शाम को आपकी कन्या की कथा सुने और सुनावे। जैसे ही पलड़े बराबर होंगे, घर की समस्या कट जाएगी। एक सुधि दीदी तो क्या ही कर लेगी, पर यह व्रत, बहुतों का भला करेगा।

**********

कहने की आवश्यकता नहीं कि जैसा सुधि दीदी ने कहा था, वैसा ही हुआ। अन्नपूर्णा माता का व्रत, सुनते हैं, अब भी उस प्रदेश में होता है। सुधि दीदी और उनका आश्रम, दोनों को गुजरे बहुत समय बीता।

**********

Notes:

1.     Adhiya and Tihaiya are contract farming terms in the Vindhya region. In Adhiya, the landowner takes half of the produce, and in Tihaiya, 2/3rd of the produce is taken by the landowner, even though the farmer does all the hard work. Further, if the crop fails, the state govt reimbursement comes only to the landowner, not the actual tiller, since all contracts are verbal only. Not all landowners share this reimbursement with the tillers.

The tihaiya farmers of Vindhya region caught in a cycle of debt and destitution - Gaonconnection | Your Connection with Rural India

 

'Half-half farming': landlords win, tenants lose (ruralindiaonline.org)

 

2.     Dasai is an imaginary term but it refers to one tenth of the produce being taken as tax. 1/16, 1/10, and 1/6 were the agricultural tax rates from Manusmriti to Arthashastra. In Arthashastra, it is standardized to Chhath (1/6), which is where it remained till the middle ages, when Chauth (one fourth) was introduced.

 

 

 

 

 

 

Friday, April 17, 2020

Namak - A poem and Story for children

एक दिन नमक ने ठानी
नहीं चलेगी तानाशाही

पानी मेरा हर लेते हैं
वे मुझको सब छल लेते हैं

सूर्यदेव को लगायी गुहार
उन्होंने भी सुनी पुकार

"जब मैं सागर में बहता हूँ
चिरकोटि तक मैं रहता हूँ

मनुष्य मुझे पकड़ लेता है
पानी मेरा हर लेता है

फिर मेरा अंत निश्चित है
संशय नहीं इसमें किंचित है

कभी फल, कभी अचार
भाजी कभी, और कभी दाल

चाहे किसी प्रकार हो देव
अंत मेरा होता सदैव

आप अगर जल नहीं हरेंगे
तब ही मेरे प्राण बचेंगे।"

सूर्यदेव ने कहा "ज़रूर!
नमक से पानी न होगा दूर!"

उस दिन से कमाल हो गया!
आदमी बेहाल हो गया!

दिन दिन बीते, पानी न जाए
नमक कोई अब कैसे बनाये?

निकाले बड़े बड़े पतीले
आग जलाई उनके नीचे

अब तो नमक सकपकाया
पानी भी बहुत घबराया

बहुत लगा लकड़ी और तेल
नमक का भाव सब से तेज़

लोग नमक अब कम थे खाते
किफ़ायत से थे काम चलाते

नमक के अब सब गुण गाते थे
रासायनिक विधा समझाते थे

मिटटी का तेल धीरे से हँसता
दाम से ही है मूल्य बनता।

One day, salt decided that it wants freedom. It went straight to the Sun God and requested him to not take the water away, because, in the sea, salt lives forever, but as soon as Man takes it out, it stares at certain death. The Sun God agreed.
This led to major issues among humans. They then took out huge boilers and boiled the water away. This made salt very expensive, and people started using it less. They now started praising salt as an exotic spice and wrote chapters about the difficult process of extraction of salt.
Crude oil laughed quietly on the side. "It is true then, our price determines our worth."

Monday, October 01, 2018

Siddhi

एक दैत्य था. उस ने विष्णु जी बड़ी तपस्या की. अंत में विष्णु जी प्रकट हुए और उस से वर मांगने को कहा. दैत्य लालची था. उसने कहा, "भगवन, मुझे वह सिद्धि दीजिये, जो सारी दुनिया में किसी के पास न हो. विष्णु जी ने उस से सोचने के लिए कुछ समय माँगा. वापिस आ कर देवताओं से मंत्रणा करने लगे. 


अंत में, जैसा कि प्राय: होता है, नारद मुनि ने हल बताया - भगवन, उसे अज्ञान की सिद्धि दीजिये. उसे अपने घरवालों की बात हमेशा बुरी लगे, और बाहर वालों की भली. अपने हितैषियों का परामर्श बुरा लगे, और चापलूसों की झूठी तारीफ भली. 


उसे हर भली चीज़ बुरी लगे, और बुरी चीज़ भली. उसे अच्छाई नहीं, चमकीली सुंदरता पसंद हो.  


ऐसा वरदान उसे दीजिये प्रभु. उसे वह सिद्धि दीजिये, जो किसी के पास नहीं है - अपने हित को अहित , और अहित को हित माने. 


अपने अज्ञान से वह स्वयं ही अपना सर्वनाश कर लेगा. उसे क्षणिक सफलता मिलेगी, परन्तु अंतत:, उसका जीवन असाध्य हो जायेगा.


विष्णु भगवन ने अपने भक्त के साथ छल किया, और उसे वही अज्ञान की सिद्धि दी.


मैंने सुना है, कि उस दैत्य के बहुत वंशज हुए. अपने आस पास के चापलूसों के मत से, उसने अपने सभी हितैषियों से सम्बन्ध तोड़ दिए. 


मैंने सुना है, कि आज उस दैत्य के वंशज, सारी धरती पर बहुतायत में घुमते हैं. 


Sunday, July 16, 2017

On Work Life Balance - The story of the scientist

Once, there was a scientist. He was brilliant at his work and it kept him very very busy. He was at his work all  the time - late nights, weekends, everything. This scientist spent no time with his family at all.


One day, his wife left him. He was very distraught and could not understand why. So he called her, and she told him that she had left him because he never had any time for her and the child, being forever busy with the work.
He was very sad to hear it.


After she left, he realised how hard it was to do the simple things in a house - to keep it clean, to have 3 meals on the table, to just sleep at night - alone. When he had returned from work, he had just assumed that his wife and child would be there, so when he went to sleep, he was not alone in the house. Even if he never spoke to them, he realised now how much their presence meant.


After a few days, he was very sad and lonely. It was impossible to both keep house and maintain his work. So he decided to make amends and called his wife again. He told her that he would change now, spend more time at home. That he had learnt his lesson. Could she and the child please come back?


The wife replied, "It is not what you do, my darling. Over the years, I have realised, this is who you are. It is not something you do deliberately. As a personality, you value your work above all else. If I come back, you will make efforts for a few days, but will eventually go back to being who you really are. No my dear, it is best that you live with that which matters to you - your work." And so saying, she refused to come home.


He was very sad after this talk and just could not concentrate on work. His colleague saw him sad and asked what had happened. He told him everything and then said, "The thing is, my wife is right. I am inherently like that. I do love my work above all else. But I also miss my family a lot. I don't know what to do."


The friend then said, " Let us say that you plant 2 trees at the same time. You have a limited amount of water and manure each day.  If you give all of your water and manure to one tree, it will grow big and strong and definitely taller and bigger than all other trees around it planted at the same time. But the other tree will wilt within a short time and die away. Then you cannot bring it back.


If you divide your water and manure among the 2 trees, they will both grow only moderately, you will never touch the heights that you could have touched with either, but they will both be in your garden.


This is a decision that we all have to make. If we pay no attention to the family, we can reach great heights in our careers, because our time and attention is the water and manure that we have every day. If we do work life balance, we must do so with the conscious idea that we will not win Nobel prizes in our profession so easily. But we will have a family to go home to.


Everyday, that water and manure - our time and attention, must be divided between the 2 trees. But most importantly, you must know,  that the trees are exactly the way you want them to be. It is, my friend, time for you to make a decision. If you want to rise to great heights in your career, you must abide by the decision of your wife - because she is right. And if you want your family, you must know, right now, that it will be wise to sacrifice some of your ambition. You will see some of your colleagues outshine you. And you must not regret or grudge them their success or ambition, for you have traded happily, the place on the podium for a place by the hearth. It must be a conscious decision - one that you take for yourself, and not one that is taken for you.  Your wife has taken a decision once for you. Don't let that happen again. Go home and think. "


With these words, the colleague left the scientist. The scientist came home and thought. All of that night and all of the next day he thought.
That night, he called his wife again. He spoke to her at length, and by next morning, she had come home with the child.


The scientist and his family were happy this time. They lived together for many years. Finally, the son grew up. He studied, and started earning his own living. It was then time for him to get married. He fell in love with a very smart young lady, and announced the decision to his parents. His parents welcomed the idea and the young lady into their home.


That night, the scientist took his son aside, and said, "There is something I must share with you. You do know that there are 2 pots in the garden that I always take care of myself. No matter how large the garden or how small, no gardener is allowed to touch my 2 plants. You have often asked me the secret of my fascination for those 2 plants. I will tell you today. It is not the plants. It is the pots that house those plants.


Many years ago, your mother left me because I had no time for you and her. When I pleaded with her to come back, she reminded me, that I was not busy at work so as to avoid her. This is who I was. And I would do it again. She was right, of course. Your mother always is. So one night, I brought these 2 tiny saplings home. I told her, that I was going to nurture both those plants. Every morning, I would water them the same way that I had divided my time between home and work the previous day. So if I had ignored my family for a day because of an important thing at work, I ignored the family plant entirely the next morning. On a good day, I would come home on time and spend time teaching you, asking her about her day and telling her about mine. On such a day, I would water and nurture both plants equally. On the weekends, I would not work. And then, I would not nurture or weed the work plant either.


In this way, the minute a plant starts to wilt, I will know that that aspect of my life needs attention. If one plant was not flourishing, I would know before any real harm came to my life. Over the years, those plants have been my daily reminders, companions and guides. When you get married, remember to plant such saplings, so that you and your wife always remember that a family needs attention too. That is the secret of my 2 plants, and why I wouldn't let any gardener interfere with those 2 pots."


The son was amazed to hear this. He had never imagined that 2 pots could mean so much to his father. Or to anyone. He had no idea that he really needed to work on being a family. He thought it just happened on its own. Then he reflected upon his own hours at work, and smiled. He was his father's son all right. He was going to need the 2 pots of his own.

Tuesday, June 07, 2016

Dear Diary...

३ घर, ३ बच्चे, ३ डायरी....

3 houses, 3 children, 3 diaries...

*********************************
 Dear Diary 

आज हमारे घर में लड़ाई हुई. बड़ा मज़ा आया. कितने सालों में, इस घर में लड़ाई ही नहीं हुई! मम्मी जो कहती है, पापा मान जाते हैं. पापा जो कहते हैं, मम्मी मान जाती है. जब नहीं मानते तो उन में से एक उठ के चला जाता है.

आज तो पापा मम्मी तू तू मैं मैं! पूछो ही मत!

अच्छा, बाकी बातें कल.


*******************
Dear Diary

My parents fought today. Again.
All this cacophony really drives me nuts. Why can't they be quiet for just ONE day? In this house, either they are quiet or they are fighting. I don't know what normal talking feels like!

Any day, ANY DAY AT ALL - my birthday, their birthday, Diwali, Annual Day.. there is always a fight. And God save us if Dadi or nani is here. Then they fight even more bitterly. If dadi is here, papa fights more because dadi keeps telling him all the wrong things mom has done. If nani is here, papa fights more because he hates having nani over.

I don't get it. I just don't get it. I hate my life!

*************************

Dear Diary

हमारे घर में आज लड़ाई नहीं हुई. कितनी अच्छी बात है! आज मेरा रिजल्ट आया था. मैं कक्षा में अव्वल आई हूँ न... तो पापा और मम्मी दोनों बड़े खुश थे. पापा ने हमें फ्रॉक दिलाई और मम्मी ने चॉकलेट ले के दी.

दोनों ने एक दुसरे को ताने भी नहीं मारे. मुझे तो यकीन ही नहीं  होता। ये मेरे ही मम्मी पापा हैं!

अब से मैं हमेशा अव्वल आऊंगी. तब पापा मम्मी नहीं लड़ेंगे. मम्मी कहती है, की मैं न होती तो वो पापा को छोड़ कर चली जाती. मैंने उनकी ज़िन्दगी ख़राब कर दी. पर अगर मैं अव्वल आऊंगी, तो पापा मम्मी को प्यार करेंगे. तब मम्मी गुस्सा नहीं होगी. तब लड़ाई नहीं, और लड़ाई नहीं, तो मम्मी की ज़िन्दगी भी ख़राब नहीं!

कभी कभी मुझे लगता है, की मैं बड़ी जमझदारी की बातें करती हूँ. और तुम्हे?

अच्छा, कल मिलेंगे!
*****************

Monday, October 19, 2015

The Moth who wouldn't be Moth

Many years ago, deep, deep inside a forest, there lived.. a tiny little moth. During the day, it feared for its life, and at night, it feared the dark. The only time it could go out to feed was at dusk and at dawn, when it wasn't bright enough for others to see him, and wasn't dark enough for him to be scared.

In time, it was time for the moth to grow and multiply. But the moth's child was an imp! Like all larvae, it ate and ate and ate. Besotted it was with the rainbow and the colors of the flowers and the leaves on trees and all things bright! Explain as he might to the child, the moth could not make him see sense: "To be a moth, you have to be invisible. Your safety depends on it. Your whole life depends on it! If a moth were to be as bright and colourful as the butterfly, why, it would die in a day! And then what is the use of being so colourful and bright? "

But the moth child, he paid no heed. Inside the cocoon, he prayed and prayed and wished and wished. What did his father know about desire that burns so much, that one would rather go up in ashes realising that dream, than live in the ashes of the dream? His father didn't know that. But he did.

One day, the moth child just KNEW that when the cocoon falls off, he will not be a grey-brown moth. He will be the MOST colourful, amazing, resplendent moth in the history of moth-hood! And some smart bird with sharp eyes will spot him within an hour of being born and will eat him up. But what did that matter? It would be an hour, or a few moments even, of being ALIVE.

As the time approached, he waited for the cocoon to fall off. But it wouldn't. He was comfortable inside the cocoon, but bored. And it was time. He couldn't wait to find out! Inside the cocoon, all was dark. He didn't know who he had become. Or What. He KNEW inside his heart, but there was no way to find out.

Outside the cocoon, the moth father waited. He wanted to see if his son had realised his dream. He wanted to be there to protect him, just in case the young fool really did do something rash to his appearance. But he waited, and waited. The cocoon was not even drying up, much less falling! The other moth kids came and went, but his son, just NEVER did anything on time!

Finally, at long last, and just when the father was about to give up and fly away to grieve for his son, the cocoon, started to fall. A little at first, but enough for the moth child to gather his courage and try to get out. So he tried, and tried, and tried. And got out.

The father could not believe his eyes! This was not a moth child at all! This was just.. someone else!
The newspapers of mothworld in the jungle came for interviews. The moth child was all over the news! So well protected was he, and so well taken care of, that no one dared to attack him, much less devour him. He was venerated wherever he went, even by those of other species. Everyone asked him how a moth could do this - be so colourful and bright and ... multi-hued? How does a moth become a butterfly in the shape of a moth?

The moth child didn't know. He couldn't answer those questions. He tried to tell them that it was just the desire that burned him from within - that he wanted it so bad, and prayed for it so hard that God just found a way to give it to him. But the news reporters would have none of that. Prayers and desire and stuff was just not a "Story" . They wanted to hear about his 'miracle recipe', his 'magic potion' , the special things he did as a larva and pupa to come out like this. The father and son scratched their heads and then gave up.

They just decided to call him "Steve Jobs". And let publicity do the rest. Very soon, someone wrote a  biography. There was merchandise. People paid him just to use his name. They were rich. Very rich.

One day, the son sat in silence at their mansion. The father walked up to him and asked him why he was so silent. Very slowly, the son replied, "The MOST Important part of my story, Dad, was the Fire. They paid for my story, but they never got the message, did they?"
The father replied, equally slowly, "Son, they got what they wanted to get."

Note: This story is based on a picture created by my friend. This one: