Saturday, December 24, 2016

Today's gratitude

is for this thought:


Write your sorrows in sand, and your gratitude in granite. Leave the sand on the beach and use the granite on your kitchen slab.



Sunday, December 18, 2016

पहेलियाँ

कौन सी दो बातें सब से ज़्यादा दुःख देती हैं?


१. किसी का हो कर भी न होना.
२. किसी का न हो कर भी हर समय होना.




What are the 2 greatest sorrows that we know?
1. Someone who is here, and still isn't.
2. Someone who is not here, and still is. Always.








कौन दो लोग सब से ज़्यादा दुःख देते हैं?
१. कोइ ऐसा जो हो कर भी न हो. 
२. कोइ ऐसा जो जीवन में नहीं है, पर मन में हर समय होता है. 

Friday, December 16, 2016

Acknowledge that mental illness is not another malady

जैसे हम लोग ये मानते हैं कि AIDS या cancer जीवनघाती रोग है, terminal illness है, वैसे ही हमें ये भी स्वीकार करना चाहिए की अवसाद (depression) या और मानसिक रोग भी जीवन घाती (terminal illnesses) हैं.


इन रोगों को भी वही इज़्ज़त, या कम से कम वही acknowledgement तो मिलना चाहिए. लोगों को मालूम तो होना चाहिए की अगर किसी को अवसाद है, तो ये निश्चित नहीं की वो ठीक हो ही जाएगा.


जिस तरह हम कर्करोग या एड्स के मरीजों के अधिकारों में अपने जाने का समय चुनने के अधिकार की शिरकत करते हैं, यही शिरकत मानसिक रोग के रोगियों के लिए क्यों नहीं की जाती?


We speak about AIDS and cancer, and acknowledge the terminal nature of some of the cases of these illnesses. Why don't we accord the same seriousness and the same acknowledgement to mental illnesses?


We speak the right to die with dignity for patients who suffer from terminal illnesses of the body. Why don't we include that right among the rights of those affected by life long, terminal mental illnesses?

कतरनें

आज, बड़ी अजीब बात हुई. रेडियो पर, कोई  गानों को मिला कर, गा रहा था. और मेरे दिमाग में आया, की ये गाने, तुम्हे गाने चाहिए... ये बस तुम्हारी ही आवाज़ में अच्छे लगेंगे. इसी तरह , ठीक इसी बुनावट में. बस आवाज़ तुम्हारी हो.


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मैं रोज़ अच्छे कपडे पहनता हूँ. इत्र रोज़ लगता है. और बाल भी रोज़ संवरते हैं. लोग कहते हैं की लड़के इतने सजीले अमूमन होते नहीं हैं. पर तुम पता नहीं किस दिन मिल जाओ, यूँ ही, कहीं भी..


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Thursday, December 08, 2016

RIP

I belong
to a world gone by
When it came to its expiry date
That world expired.
Leaving its inhabitants
out in the cold
The world did not know
that the expiry date of the world
is also
the expiry date
of its inhabitants
Someone, someplace
made a mistake
and now I live
well past my expiry date
in a world
that is no more.

The unlovables

We are
the unlovables. The ones
who
are
too aggressive
too demanding
too compulsive
too rigid.
we are
the unlovable ones

Friday, December 02, 2016

Friendships

Friendship is just a tag.


But its something.
In a world full of nothings
Its a very important something.

On social media and loneliness

शायद ऐसा ही होता है लोगों के साथ... शायद ऐसे ही शुरू होता है सब कुछ. चुप रहने का सिलसिला, चुप करा देने के सिलसिले से भी शुरू हो सकता है, और चुप होने से भी.


लोग सोचते नहीं, बोलते बहुत हैं. किसी चीज़ के बारे में विचार व्यक्त करने के लिए, उस चीज़ के बारे में जानना भी ज़रूरी है, ये कहाँ लिखा है?


 बिना सोचे बोलने वालों से मुझे सख्त चिढ़ हुआ करती थी. अब भी है.


फिर देखा, चारों ओर , लोगों की बातों का शोर. इतने लोग, इतनी बातें, ज़्यादातर वो बातें जिन्हें कहने की करने की, कोई ज़रुरत ही नहीं. और बातें भी, वो नहीं जो ऐसे ही दोंस्तों में की जाएँ। सारी दुनिया को सुनाई जाएँ और उन से टिपण्णी की उम्मीद भी हो.


वे लोग, जिनकी बातें अच्छी लगती हैं, धीरे धीरे काम बात करने लगे. फूहड़पन बेशर्म भी होता है. दानाई शर्मीली. बस  यही हुआ हमारी दुनिया के साथ. दानाई शर्मा गयी, फूहड़पन को मंच मिल गया..यही मंच आगे जा कर सोशल मीडिया बना. 


और अंदर की बातें? अंदर ही खो गयी कहीं. न कोई हमनवा, न हमराज़, न हमदम, न हबीब।